Poems of Kabir : कबीर बानी

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले। हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार बार वाको क्यों खोले। हलकी थी तब चढ़ी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोले। सुरत-कलारी भई मतवारी, मदवा पी गई बिन तोले।। हंसा पाये मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोले। तेरा साहब है घर माहीं, बाहर नैना क्यों खोले। कहैं कबीर सुनो भाई साधो, साहब…

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आज की पंक्तियाँ

उर्दू से लिप्यंतरण : मुमताज़ इक़बाल मुनीर मोमिन सुपरिचित, सम्मानित और समकालीन बलोची कवि हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत बलोची नज़्में उनके मज्मुए ‘गुमशुदा समुंदर की आवाज़’ से चुनी गई हैं। बलोची से उर्दू में इनका तर्जुमा अहसान असग़र ने किया है। source:sadaneera.com

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The Beloved City

Originally posted on Borderless:
Poetry of Munir Momin, translated from Balochi by Fazal Baloch Munir Momin is a contemporary Balochi poet widely cherished for his sublime art of poetry. Meticulously crafted images, linguistic finesse and profound aesthetic sense have earned him a distinguished place in Balochi literature. His poetry speaks through images, more than words.…

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लफ़्ज़… मरजान : मुनीर मोमिन

लफ़्ज़… मरजान मैं नहीं जानता ये शहर ख़ुद को क्यों मेरे अंदर के गलियारों में गुम कर देना चाहता है मैं! अगर मुझसे परिंदा चूगा माँगे मैं उसे दो लफ़्ज़ दूँगा। ये शहर क्यों अपने चराग़ों को आवाज़ की गठरी में बाँध कर मेरे सरहाने रख देता है तुम जानते हो! मेरी ख़्वाबगाह में आवाज़ों…

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Meer Taqi Meer मीर तक़ी मीर

इश्क़ में जी को सबरो-ताब कहां उससे आंखें लगें तो ख्वाब कहां हस्ती अपनी है बीच में पर्दा हम न होवें तो फिर हिजाब1कहां गिरिया-ए-शब2 से सुर्ख हैं आंखें मुझ बलानोश को शराब कहां इश्क़ है आशिक़ों के जलने को ये जहन्नुम3 में है अज़ाब4 कहां इश्क़ का घर है मीर से आबाद ऐसे फिर…

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आज का चुनिंदा अशआर : साक़ी फ़ारूक़ी

हद-बंदी-ए-ख़िज़ाँ = setting limits of autumn, हिसार-ए-बहार = circle of spring रक़्स = dance

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चुनिंदा अशआर : ज़ेहरा निगाह

मय-ए-हयात में शामिल है तल्ख़ी-ए-दौराँ जभी तो पी के तरसते हैं बे-ख़ुदी के लिए मय-ए-हयात = wine of existence, तल्ख़ी-ए-दौराँ = hard times … औरत के ख़ुदा दो हैं हक़ीक़ी ओ मजाज़ी पर उस के लिए कोई भी अच्छा नहीं होता हक़ीक़ी = real, actual मजाज़ी = metaphorical, allusive … टूटे-फूटे लफ़्ज़ों के कुछ रंग…

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कुछ चुने हुए शेर : मरग़ूब अली

हर्फ़ नाकाम जहाँ होते हैं उन लम्हों में फूल खिलते हैं बहुत बात के सन्नाटे में .. लब पर उगाऊँ उस के धनक फूल क़हक़हे आँखों में उस की फैला समुंदर समेट लूँ .. हर रास्ता कहीं न कहीं मुड़ ही जाएगा रिश्तों के बीच थोड़ा बहुत फ़ासला भी रख .. कुर्सी मेज़ किताबें? बिस्तर…

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आज का चुनिंदा अशआर

ख़ुलूस-ए-दिल = purity of heart सज्दा = To bow down in devotion and faith जबीं = forehead

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आज का चुनिंदा अशआर

परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम = maintaining the pen & paper रक़म = writing, money, wealth

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ग़ज़ल : मोहसिन नक़वी

नया है शहर नए आसरे तलाश करूँ तू खो गया है कहाँ अब तुझे तलाश करूँ जो दश्त में भी जलाते थे फ़स्ल-ए-गुल के चराग़ मैं शहर में भी वही आबले तलाश करूँ तू अक्स है तो कभी मेरी चश्म-ए-तर में उतर तिरे लिए मैं कहाँ आइने तलाश करूँ तुझे हवास की आवारगी का इल्म…

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आज का चुनिंदा अशआर

अब्र = cloud बातिन = the mind, the heart मंज़र = spectacle लहज़ा-ए-इदराक = moment of senses, awareness

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गज़ल : ज़ेहरा निगाह

My favourites are 3’rd, 5’th & 6’th sher. छलक रही है मय-ए-नाब तिश्नगी के लिए सँवर रही है तिरी बज़्म बरहमी के लिए नहीं नहीं हमें अब तेरी जुस्तुजू भी नहीं तुझे भी भूल गए हम तिरी ख़ुशी के लिए जो तीरगी में हुवैदा हो क़ल्ब-ए-इंसाँ से ज़िया-नवाज़ वो शोला है तीरगी के लिए कहाँ…

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गज़ल : आदिल रज़ा मंसूरी

चाँद तारे बना के काग़ज़ पर ख़ुश हुए घर सजा के काग़ज़ पर बस्तियाँ क्यूँ तलाश करते हैं लोग जंगल उगा के काग़ज़ पर जाने क्या हम से कह गया मौसम ख़ुश्क पत्ता गिरा के काग़ज़ पर हँसते हँसते मिटा दिए उस ने शहर कितने बसा के काग़ज़ पर हम ने चाहा कि हम भी…

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आज का चुनिंदा अशआर

तजल्ली = splendour, manifestation simple explanation : This whole world( tavern ) is such a splendour, such a manifestation of ‘his’ love / beauty/ light, that real joy, real pleasure is not in drinking but in losing one’s self in this brilliance. Sufi poetry.

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Daily Musings : 97

हर्फ़-ए-ना-गुफ़्ता = unsaid word ला-फ़ानी = immortal simple translation : let me write silence on the lips of ‘sher’ (verse) let me make immortal ‘the unsaid word’. Silence speaks more than words, if we can learn the art of reading silence, our heart will be filled with so many immortal words. Be it a word…

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Daily Musings : 96

जा = place जल्वा-ए-माशूक़ = vision of the beloved शौक़-ए-दीदार = pleasure of seeing नज़र = vision simple translation : There is no place where you cannot see the beloved, if you wish to have pleasure of seeing him/her, develop your vision. In other words; when you have developed your vision to see, you can…

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Daily Musings : 95

हरीम-ए-इश्क़ = sacred space of love हस्ती = existence simple translation: your existence itself is a crime in a sacred space of love do not enter here with your ‘ego’ . in other words, when you’re in love, you do not exist separately from your beloved, you’re one with him. So your ego, your’ head’,…

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जे़हनों में ख़याल जल रहे हैं

जे़हनों में ख़याल जल रहे हैं जे़हनों में ख़याल जल रहे हैंसोचों के अलाव-से लगे हैं अलाव = bonfire दुनिया की गिरिफ्त में हैं साये,हम अपना वुजूद ढूंढते हैं अब भूख से कोई क्या मरेगा,मंडी में ज़मीर बिक रहे हैं माज़ी में तो सिर्फ़ दिल दुखते थे,इस दौर में ज़ेहन भी दुखे हैं ज़ेहन =…

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Daily Musings : 66

Translation : तुख़्म = seed सर्व-ए-चराग़ाँ = graceful display of lamps, चराग़ों से जगमगाता हुआ पेड़ if time permits, (if Time will give me freedom) I will show (them this) amusement My each heart sore is a seed of a tree, illuminated with lamps. meanings, source : rekhta.org

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Daily Musings : 65

*मुनव्वर = प्रकाशमान Translation : There is light everywhere ( I see ) Who is the luminous ( beaming with light ) one in my eyes (?)

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Daily Musings : 64

Simple Translation : ( I saw ) My soul (my life ) melting in each moment Spent night drop by drop ( crying, in grief ) My hands shaking, quivering ( But) ( I came out of all this) on my own, I took control of myself. ~ Kishwar Naheed Translation : Nehal.

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जिसे लिखता है सूरज : निदा फ़ाज़ली

जिसे लिखता है सूरज वो आयी! और उसने मुस्कुरा के मेरी बढ़ती उम्र के सारे पुराने जाने अनजाने बरस पहले हवाओं में उड़ाये और फिर मेरी ज़बाँ के सारे लफ़्जों को ग़ज़ल को गीत को दोहों को नज़्मों को खुली खिड़की से बाहर फेंक कर यूँ खिलखिलाई क़लम ने मेज़ पर लेटे ही लेटे आँख…

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नज़्म : गुलज़ार

मैं जितनी भी ज़बानें बोल सकता हूँ वो सारी आज़माई हैं… ‘ख़ुदा’ ने एक भी समझी नहीं अब तक, न वो गर्दन हिलाता है, न वो हंकारा ही देता है! कुछ ऐसा सोच कर— शायद फ़रिश्तों ही से पढ़वा ले, कभी मैं चाँद की तख़्ती पे लिख देता हूँ, कोई शेर ‘ग़ालिब’ का तो धो…

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गज़ल – निदा फ़ाज़ली

सफ़र को जब भी किसी दास्तान में रखना क़दम यक़ीन में मंज़िल गुमान में रखना  जो साथ है वही घर का नसीब है लेकिन जो खो गया है उसे भी मकान में रखना  जो देखती हैं निगाहें वही नहीं सब कुछ ये एहतियात भी अपने बयान में रखा  वो एक ख़्वाब जो चेहरा कभी नहीं बनता बना के चाँद…

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कुछ चुने हुए शेर, ग़ज़ल – राहत इंदौरी

मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए * ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो मेयारी = qualitative * आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के *…

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कुछ अशआर, नज़्म – निदा फ़ाज़ली

यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है  मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है  चलता जाता है कारवान-ए-हयात  इब्तिदा क्या है इंतिहा क्या है  ख़ुद से मिलने का चलन आम नहीं है वर्ना  अपने…

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मेरा सफ़र. – अली सरदार जाफ़री

हमचू सब्ज़ा बारहा रोईदा-ईम (हम हरियाली की तरह बार-बार उगे हैं) रूमी … फिर इक दिन ऐसा आएगा आँखों के दिये बुझ जाएँगे हाथों के कँवल कुम्हलाएँगे और बर्गे-ज़बाँ से नुत्क़ो-सदा की हर तितली उड़ जाएगी इक काले समन्दर की तह में कलियों की तरह से खिलती हुई फूलों की तरह से हँसती हुई सारी…

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फ़हमीदा रियाज़ – ग़ज़ल

क्यूँ नूर-ए-अबद दिल में गुज़र कर नहीं पाता                 नूर-ए-अबद  = eternal light सीने की सियाही से नया हर्फ़ लिखा है                       हर्फ़  = word .. .. .. .. ये पैरहन जो मिरी रूह का उतर न सका…

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घास तो मुझ जैसी है – The Grass is really like me : Kishwar Naheed

THE GRASS IS REALLY LIKE ME The grass is also like me it has to unfurl underfoot to fulfill itself but what does its wetness manifest: a scorching sense of shame or the heat of emotion? The grass is also like me As soon as it can raise its head the lawnmower obsessed with flattening…

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A poem / કવિતા – Jameela Nishat

A poem slumbers in my heart, at the centre of my being, and a dim mirror tries to shape it a ghazal a line a word. Day and night it pulls me toward itself, no music, no sound, even silence seems to intrude. What poem is this that sleeps in me and does not let…

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ग़ज़ल – साहिर देहल्वी ( સરળ ગુજરાતી સમજૂતી સાથે )

दरमियान-ए-जिस्म-ओ-जाँ है इक अजब सूरत की आड़ मुझ को दिल की दिल को है मेरी अनानियत की आड़ आ गया तर्क-ए-ख़ुदी का गर कभी भूले से ध्यान दिल ने पैदा की हर एक जानिब से हर सूरत की आड़ देते हैं दिल के एवज़ वो दर्द बहर-ए-इम्तिहाँ लेते हैं नाम-ए-ख़ुदा अपनी तमानिय्यत की आड़ नफ़्स-परवर…

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रौशन जमाल-ए-यार से है- हसरत मोहानी

This particular Ghazal starts with the description of a beautiful beloved and in the last two Sher, there is mention of ongoing struggle for freedom; that is what I found very interesting. This Ghazal is beautifully written. …………………………………. रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम               जमाल-ए-यार = beauty of the beloved…

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ज़िन्दगी से उन्स है – साहिर लुधियानवी

ज़िन्दगी से उन्स है     उन्स- प्रेम हुस्न से लगाव है धड़कनों में आज भी इश्क़ का अलाव है दिल अभी बुझा नहीं रंग भर रहा हूँ मैं ख़ाका ए-हयात में         ख़ाका ए-हयात- जीवन चित्र आज भी हूँ मुन्हमिक       मुन्हमिक- व्यस्त फ़िक्रे-कायनात में          फ़िक्रे-कायनात-…

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जश़्ने सुख़नगोई, ब्लोग के पाँचवे जन्मदिन पर…

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो ( मेयारी – qualitative) राहत इंदौरी …….. तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा तिरे सामने आसमाँ और भी हैं   (शाहीं= eagle) अल्लामा इक़बाल  ब्लोग जगत के मेरे मित्रों, अपने ब्लोग के पाँच साल पूरे होने की खुशी…

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સાલમુબારક. બ્લોગની પાંચમી વર્ષગાંઠ નિમિત્તે…

મારા બ્લોગના વાચકમિત્રો, આ ઉજવણી તમારા સૌની પ્રત્યે ખરા દિલથી આભાર વ્યક્ત કર્યા વિના અધૂરી છે. એવું લાગે છે કે હજુ ગઈકાલે તો આ બ્લોગ શરુ કર્યો હતો, અને પા-પા પગલી ભરતાં ક્યારે પાંચ વર્ષ પૂરા થઈ ગયા ખબર જ ન પડી. જો આંકડાઓની ભાષામાં વાત કરીએ તો 16,550 થી વધારે લોકો વિશ્વના નાના-મોટા 50…

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गज़ल – क़तील शिफ़ाई

अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते करते याद तुझ को अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ आख़री हिचकी…

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मिलना न मिलना एक बहाना है और बस – सलीम कौसर

मिलना न मिलना एक बहाना है और बस तुम सच हो बाक़ी जो है फ़साना है और बस लोगों को रास्ते की ज़रूरत है और मुझे इक संग-ए-रहगुज़र को हटाना है और बस                   संग-ए-रहगुज़र = stone on the way मसरूफ़ियत ज़ियादा नहीं है मिरी यहाँ मिट्टी…

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कुछ चुने हुए शेर : ​सलीम कौसर

बिछड़ती और मिलती साअतों के दरमियान इक पल यही इक पल बचाने के लिए सब कुछ गँवाया है                       साअतों = times : : : साँस लेने से भी भरता नहीं सीने का ख़ला जाने क्या शय है जो बे-दख़्ल हुई है मुझ में  …

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कुछ चुने हुए शेर:​ सूर्यभानु गुप्त

जिनके नामों पे आज रस्ते हैं वे ही रस्तों की धूल थे पहले …… अन्नदाता हैं अब गुलाबों के जितने सूखे बबूल थे पहले …… मूरतें कुछ निकाल ही लाया पत्थरों तक अगर गया कोई ……. यहाँ रद्दी में बिक जाते हैं शाइर गगन ने छोड़ दी ऊँचाइयाँ हैं कथा हर ज़िंदगी की द्रोपदी-सी बड़ी…

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नज़्म – अमीक़ हनफ़ी (સરળ ગુજરાતી ભાવાનુવાદ સાથે)

ज़ात का आईना-ख़ाना जिस में रौशन इक चराग़-ए-आरज़ू चार-सू ज़ाफ़रानी रौशनी के दाएरे मुख़्तलिफ़ हैं आईनों के ज़ाविए एक लेकिन अक्स-ए-ज़ात; इक इकाई पर उसी की ज़र्ब से कसरत-ए-वहदत का पैदा है तिलिस्म ख़ल्वत-ए-आईना-ख़ाना में कहीं कोई नहीं सिर्फ़ मैं! मैं ही बुत और मैं ही बुत-परस्त! मैं ही बज़्म-ए-ज़ात में रौनक़-अफ़रोज़ जल्वा-हा-ए-ज़ात को देता…

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नज़्म – साहिर लुधियानवी

अश्कों में जो पाया है, वो गीतों में दिया है इस पर भी सुना है, कि ज़माने को गिला है जो तार से निकली है, वो धुन सबने सुनी है जो साज़ पे गुज़री है, वो किस दिल को पता है …… ज़िन्दगी से उन्स है हुस्न से लगाव है धड़कनों में आज भी इश़्क…

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ग़ज़ल – कुमार पाशी

अपने गिर्द-ओ-पेश का भी कुछ पता रख दिल की दुनिया तो मगर सब से जुदा रख लिख बयाज़-ए-मर्ग में हर जा अनल-हक़ और किताब-ए-ज़ीस्त में बाब-ए-ख़ुदा रख उस की रंगत और निखरेगी ख़िज़ाँ में ये ग़मों की शाख़ है इस को हरा रख आ ही जाएगी उदासी बाल खोले आज अपने दिल का दरवाज़ा खुला…

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कुमार पाशी – चुनिंदा अशआर

हवा के रंग में दुनिया पे आश्कार हुआ मैं क़ैद-ए-जिस्म से निकला तो बे-कनार हुआ आश्कार = clear, manifest, visible, व्यक्त, प्रकट, ज़ाहिर, स्पष्ट, साफ़ बे-कनार = boundless, without a shore, infinite **** पढ़ के हक़ाएक़ कहीं न अंधा हो जाऊँ मुझ को अब हो सके तो कुछ अफ़्साने दो हक़ाएक़ = facts, realities ****…

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ग़ज़ल – शहरयार

बताऊँ किस तरह अहबाब को आँखें जो ऐसी हैं कि कल पलकों से टूटी नींद की किर्चें समेटी हैं सफ़र मैंने समंदर का किया काग़ज़ की कश्ती में तमाशाई निगाहें इसलिए बेज़ार इतनी हैं ख़ुदा मेरे अता कर मुझको गोयाई कि कह पाऊँ ज़मीं पर रात-दिन जो बातें होती मैंने देखी हैं तू अपने फ़ैसले…

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તારે નામે લખું છું – કુમાર પાશી

તારે નામે લખું છું તારે નામે લખું છું: સિતારા, પતંગિયાં, આગિયા તારા રસ્તાઓ સીધા સરળ હોય એના પર છાયા હોય ઝગમગતા આકાશની અણદેખ્યા વિશ્વનાં રૂપાળાં રહસ્યો ખૂલતાં જાય તારા પર જેથી આંખોમાં તારી સ્વપ્નો હોય ઊંચેરી ઉડ્ડયનનાં તારે નામે લખું છું: આનંદ, આરજૂ, ખુશબો તારો એક એક દિવસ ખૂબસૂરત હોય, નમૂનેદાર હોય તારી કોઈ પણ…

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ग़ज़ल – दुष्यंत कुमार

कुछ चुनिंदा अशआर : सिर्फ़ शाइ’र देखता है क़हक़हों की असलियत हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं …     …    …   …   … लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो ..   ..   ..   ..    ..…

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वक़्त – जावेद अख़्तर

ये वक़्त क्या है? ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था, तब कहाँ था कहीं तो होगा गुज़र गया है तो अब कहाँ है कहीं तो होगा कहाँ से आया किधर गया है ये कब से कब तक का सिलसिला है ये वक़्त क्या है ये वाक़ये…

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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक – मिर्ज़ा ग़ालिब

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक (A prayer needs a lifetime, an answer to obtain who can live until the time that you decide to deign) दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक (snares are spread in every…

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बशीर बद्र (रोशनी के घरौंदे)

  शाम आँखों में, आँख पानी में और पानी सराए-फ़ानी में झिलमिलाते हैं कश्तियों में दीए पुल खड़े सो रहे हैं पानी में ख़ाक हो जायेगी ज़मीन इक दिन आसमानों की आसमानी में वो हवा है उसे कहाँ ढूँढूँ आग में, ख़ाक में, कि पानी में आ पहाड़ों की तरह सामने आ इन दिनों मैं…

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चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (3)

धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे गुर्बतों का दौर है जाड़ों की शिददत है बहुत …… उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मीं रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत ……. तारों भरी पलकों की बरसायी हुई ग़ज़लें है कौन पिरोये जो बिखरायी हुई ग़ज़लें ……… पास से…

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इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का – जिगर मुरादाबादी

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है दिल संग-ए-मलामत का हर-चंद निशाना है दिल फिर भी मिरा दिल है दिल ही तो ज़माना है हम इश्क़ के मारों का…

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Sunshine – Gulzar

Sunshine A golden sun shines on floating islands in the cosmos. The rarefied mist has slipped aside. Your face quivers in my palms. The morning cupped in my hands. A soft refulgence courses through my whole being. I have drunk in the drops of light, which had slipped from your radiant soul and suffused your…

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A Moment in Time – एक लम्हा : कैफ़ी आज़मी

Life is the name given to a few moments, and In but one of those fleeting moments Two eyes meet eloquently Looking up from a cup of tea, and Enter the heart piercingly And say, Today do not speak I’ll be silent too Let’s just sit thus. Holding each other’s hand United by this gift…

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मिली हवाओं में उड़ने की – वसीम बरेलवी

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो कहाँ था बस में मेरे उस को रोकना यारो मेरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो तमाम शहर ही जिस की…

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ग़ज़ल – इन्दु श्रीवास्तव

    आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ रुदादे-सफ़र पूछ मगर रास्ता न पूछ गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले सहरा कहाँ था और कहाँ ज़लज़ला न पूछ वाँ से चले हैं जबसे मुसलसल नशे में है ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ वाक़िफ़ नहीं है…

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Amen- कुछ और नज़्में

Amen Give everything away— Ideas, breath, vision, thoughts. Peel off words from the lips, and sounds from the tongue. Wipe off the lines from the palms. Give up your ego, for you are not yourself. Take off the body beautiful from your soul. Finish your prayers, say Amen! And surrender the soul. – Gulzar (…

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रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… आस्मान बुझता ही नहीं, और दरिया रौशन रहता है इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का जैसे रात में ‘प्लेन’ से रौशन शहर दिखाई देते हैं! पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के…

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उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता

उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता हमेशा हो सितारा हम-सफ़र आसाँ नहीं होता जो आँखों ओट है चेहरा उसी को देख कर जीना ये सोचा था कि आसाँ है मगर आसाँ नहीं होता बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैं सहर की राह तकना ता-सहर आसाँ नहीं होता अँधेरी कासनी रातें यहीं से हो…

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जब साज़ की लय बदल गई थी

जब साज़ की लय बदल गई थी वो रक़्स की कौन सी घड़ी थी रक़्स- dance अब याद नहीं कि ज़िंदगी में मैं आख़िरी बार कब हँसी थी जब कुछ भी न था यहाँ पे मा-क़ब्ल दुनिया किस चीज़ से बनी थी मा-क़ब्ल- before preceding, former मुट्ठी में तो रंग थे हज़ारों बस हाथ से…

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ग़ज़ल – मुसव्विर सब्ज़वारी

कोई ख़्वाब सर से परे रहा ये सफ़र सराब-ए-सफ़र रहा मैं शनाख़्त अपनी गँवा चुका गई सूरतों की तलाश में सराब-ए-सफ़र – mirage of journey, शनाख़्त – recognition, identification, knowledge इक कुतुब-ख़ाना हूँ अपने दरमियाँ खोले हुए सब किताबें सफ़्हा-ए-हर्फ़-ए-ज़ियाँ खोले हुए कुतुब-ख़ाना – library, सफ़्हा-ए-हर्फ़-ए-ज़ियाँ – page of wordloss अपने होने का कुछ एहसास…

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देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ – निदा फ़ाज़ली

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ साहिल की गिली रेत पर बच्चों के खेल-सा हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ फ़ुर्सत ने आज…

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काँच के पीछे चाँद भी था – गुलज़ार

काँच के पीछे चाँद भी था काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी तीनों थे हम, वो भी थे, और मैं भी था, तनहाई भी यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं सोंधी-सोंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी दो-दो शक्लें दिखती हैं इस बहके-से आईने में…

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ग़ज़ल – दाग़ देहलवी

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता दाग़ देहलवी काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है मुझ को ख़बर नहीं मिरी मिट्टी कहाँ की है सुन के मिरा फ़साना उन्हें लुत्फ़ आ गया सुनता हूँ अब कि रोज़ तलब क़िस्सा-ख़्वाँ की है पैग़ाम-बर की बात पर आपस में रंज क्या मेरी…

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औरत : कैफ़ी आज़मी

औरत उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे उठ मेरी जान! मेरे साथ…

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Woman – Kaifi Azmi

Woman Rise, my love!You have to walk along with me Sparks of rebellion are astir in the air, todayBoth time and life have but one resolve, todayKnocks swirl around in delicate decanters, todayLove and beauty have one voice, todayIn the fire I burn you too must burn with me Rise my love! You have to…

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कबीर बानी-Poems of Kabir

मुरली बजत अखंड सदा से, तहाँ प्रेम झनकारा है। प्रेम-हद तजी जब भाई, सत लोक की हद पुनि आई। उठत सुगंध महा अधिकाई, जाको वार न पारा है। कोटि भान राग को रूपा, बीन सत-धुन बजै अनूपा ।। यह मुरली सदा से निरंतर बज रही है, और प्रेम इसकी ध्वनी है। जब मनुष्य प्रेम की…

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मुसाफ़िर – बशीर बद्र

सदियों की गठरी सर पर ले जाती है दुनिया बच्ची बन कर वापस आती है मैं दुनिया की हद से बाहर रहता हूँ घर मेरा छोटा है लेकिन जाती है दुनिया भर के शहरों का कल्चर यक्साँ आबादी, तनहाई बनती जाती है मैं शीशे के घर में पत्थर की मछली दरिया की खुश्बू, मुझमें क्यों…

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ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ सकते हैं ज़ुजाज की ये इमारत है संग-ए-ख़ारा नहीं ख़ुदी में डूबते हैं फिर उभर भी आते हैं मगर ये हौसला-ए-मर्द-ए-हेच-कारा नहीं तिरे मक़ाम को अंजुम-शनास क्या जाने कि ख़ाक-ए-ज़िदा है तू ताबा-ए-सितारा नहीं यहीं…

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दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है

दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मालूम हुआ परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा वो ये क्या जानें बिखरने में सकूँ कितना है वो जो प्यासे थे समुंदर से भी प्यासे लौटे…

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नज़्म – गुलज़ार

ख़लाओं में तैरते जज़ीरों पे चम्पई धूप देख कैसे बरस रही है महीन कोहरा सिमट रहा है हथेलियों में अभी तलक तेरे नर्म चेहरे का लम्स एेसे छलक रहा है कि जैसे सुबह को ओक में भर लिया हो मैंने बस एक मध्दम-सी रोशनी मेरे हाथों-पैरों में बह रही है तेरे लबों पर ज़बान रखकर…

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ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई

ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई जिंदगी की तड़प बढ़ाई गई आईने से बिगड़ के बैठ गए जिनकी सूरत उन्हें दिखाई गई दुश्मनों से ही बैर निभ जाए दोस्तों से तो आश्नाई गई नस्ल-दर-नस्ल इंतज़ार रहा क़स्र टूटे न बेनवाई गई ज़िंदगी का नसीब क्या कहिए एक सीता थी…

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ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा -गुलज़ार

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा रात भर तारे बातें करते हैं रात काटे कोई किधर तन्हा अपने साये से चौंक जाते हैं उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा डूबने वाले पार जा उतरे नक़्शे-पा अपने छोड़ कर तन्हा दिन गुज़रता नहीं है लोगों में रात…

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हम्द – निदा फ़ाज़ली

I simply love this poem for its simplicity of words and high philosophy behind this! Very few writers can achieve this! . . . . . . हम्द नील गगन पर बैठे कब तक चाँद सितारों से झाँकोगे। पर्वत की ऊँची चोटी से कब तक दुनिया को देखोगे। आदर्शो के बन्द ग्रन्थों में कब तक…

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निदा फ़ाज़ली – चुनिंदा अशआर

ज़िन्दगी की सच्चाइयों को खूबसूरती से पेश करनेवाले निदा फ़ाज़ली मेरी नज़र में उजालों के , उम्मीदों के शायर है और हमारे दिलो में हमेशा ज़िन्दा रहेंगे धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो .. .. .. .. .. .. कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं…

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अहमद फ़राज़ – ख़्वाब मरते नहीं

ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसे कि जो रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएँगे जिस्म की मौत से ये भी मर जाएँगे ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब तो रौशनी हैं नवा हैं हवा हैं जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं ज़ुल्म के दोज़ख़ों से भी फुँकते नहीं रौशनी और नवा…

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अहमद फ़राज़ – चुनिंदा अशआर

चुनिंदा अशआर शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है मेरे अन्दर बारिश होती रहती है। …. मैं चुप रहा तो सारा जहाँ था मेरी तरफ हक बात की तो कोई कहाँ था मेरी तरफ। …. मैंने सितमगरों को पुकारा है खुद ‘फराज़’ वरना किसी का ध्यान कहाँ था मेरी तरफ। …. कितना आसाँ था तेरे हिज्र…

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Neglected Poems – Gulzar

A Poem Perched On a Moment A poem perched on a moment Imprisoned in a butterfly net Then its wings cut off To keep it pinned in an album: If this is not injustice, what is? Entangled in the paper the moments are mummified Only the colours of the poem remain on my fingertips! _…

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ग़ज़ल – Ghazal – कैफ़ी आज़मी

ग़ज़ल मैं ढूँढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता नयी ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नयी ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाये नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वह तेग़ मिल गयी जिससे हुआ है क़त्ल मेरा किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता वह मेरा गाँव है वो मेरे गाँव…

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धुआँ- गुलज़ार

आँखों में जल रहा है ये बुझता नहीं धुआँ उठता तो है घटा सा, बरसता नहीं धुआँ पलकों के ढापने से भी रूकता नहीं धुआँ कितनी उँडेलीं आँखें ये बुझता नहीं धुआँ आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं महमां ये गर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ चूल्हे नहीं जलाये कि बस्ती ही जल…

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Poems of Kabir- कबीर बानी

  कबीर बानी सन्तो, सहज समाधि भली। साँईते मिलन भयो जा दिन तें, सुरत न अन्त चली।। आँख न मूँदूँ काम न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ। खुले नैन मैं हँस हँस देखूँ, सुन्दर रूप निहारूँ।। कहूँ सो नाम सुनूँ सो सुमिरन, जो कछु करूँ सो पूजा। गिरह-उद्यान एकसम देखूँ, भाव मिटाऊँ दूजा।। जहँ जहँ…

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कुछ चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (2)

हम भी दरया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा ……….. जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कही मील का पत्थर नहीं देखा ………. कही यूँ भी आ मिरी आँखमें कि मिरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे,…

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मीर तक़ी मीर

मीर तक़ी मीर  (1722-23  –   1810) उर्दू के पहले सबसे बड़े शायर जिन्हें ‘ ख़ुदा-ए-सुख़न, (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है।  कुछ  अशआर दिल से रुख़सत हुई कोई ख़्वाहिश गिर्या कुछ बे-सबब नहीं आता     गिर्या- weeping, lamentation हम ख़ुदा के कभी क़ाइल ही न थे उन को देखा तो ख़ुदा याद आया  …

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चांद और सितारे – इकबाल – The Moon and The Stars

चांद और सितारे डरते-डरते दमे-सहर से तारे कह्ने लगे क़मर से नज़ारे रहे वही फ़लक पर हम थक भी गये चमक-चमक कर काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना चलना, चलना, मुदाम चलना बेताब है इस जहां की हर शै कहते है जिसे सकूं, नहीं है होगा कभी ख़त्म यह सफ़र क्या मंज़िल कभी आयेगी नज़र क्या?…

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी

मुलाक़ात यह रात उस दर्द का शजर है जो मुझसे तुझसे अज़ीमतर है अज़ीमतर है कि उसकी शाख़ों में लाख मशअल-बकफ़ सितारों के कारवां, घिर के खो गए हैं हज़ार महताब उसके साए में अपना सब नूर, रो गए हैं यह रात उस दर्द का शजर है जो मुझसे तुझसे अज़ीमतर है मगर इसी रात…

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रात पश्मीने की – गुलज़ार

    ऐसे आई है तेरी याद अचानक जैसे पगडंडी कोई पेड़ों से निकले इक घने माज़ी के जंगल में मिली हो । । : – : – : – : – : – : – : – : जिस्म के खोल के अन्दर ढूंढ़ रहा हूँ और कोई एक जो मैं हूँ , एक…

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चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (1)

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए । – – – – – – – – – – उसके लिए तो मैंने यहा तक दुआयें की मेरी तरह से कोई उसे चाहता भी हो । – – – – – — – आखो में…

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ज़िंदगी – मोहम्मद इक़बाल

बरतर अज़ अंदेशा-ए-सूदो-ज़ियां है ज़िंदगी है कभी जां और कभी तस्लीमे-जां है ज़िंदगी । तू इसे पैमाना-ए-इमरोज़ो-फ़रदा से न नाप जावदां, पैहम रवां, हर दम जवां है ज़िंदगी । अपनी दुनिया आप पैदा कर अगर ज़िंदों में है सिर्रे-आदम है ज़मीरे-कुल फ़का है ज़िंदगी । ज़िंदगानी की हक़ीक़त कोहकन के दिल से पूछ जूए-शीरो-तेशा-व-संगे-गरा है…

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મિર્ઝા ગાલિબ — હરીન્દ્ર દવે (2)

‘ હૈ કહાં તમન્નાકા દૂસરા કદમ સાકી ? હમને દશ્તે-ઇમ્કાંકો એક નક્શે-પા પાયા.’ મારી કામનાનું બીજું ચરણ ક્યાં છે, ઓ સાકી ? આ સંસાર-જગત તો મારા એક જ પગલાંમાં આવી ગયું છે ! દિલ ગુઝરગાહ-એ-ખયાલ-એ-મૈ-ઓ-સાગર હી સહી, ગર નફસ જદા-એ-સરમંઝિલ-એ-તકવા ન હુઆ. હ્રદય સુરા અને સુરાપાત્રના વિચારને પસાર થવાની રહગુઝર-પગદંડી ભલે હોય પણ એનો શો…

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મિર્ઝા ગાલિબ — હરીન્દ્ર દવે (1)

ગાલિબ એટલે વિજયી- જેનું વર્ચસ્વ પ્રવર્તતું હોય એવી વ્યક્તિ.ગાલિબનું નામ મિર્ઝા અસદુલ્લાહબેગ ખાં લાડમાં એમને મિર્ઝા નૌશાને નામે પણ સૌ ઓળખતાં.એ બહુ નાના હતા ત્યારે રચેલી થોડી કાવ્યપંક્તિઓ સાંભળી ઉર્દુના આદિ કવિ મીર તકી મીરે કહેલું કોઇ સમર્થ ગુરુ મળશે તો આ છોકરો લાજવાબ શાયર બનશે નહિ તો નિરર્થક બકવા લાગશે.આ અરસામાં ઇરાનથી ફરતાં ફરતાં…

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Poems by KABIR [1440-1518]

  My friends, today I want to share works of my favorite poet Kabir. The unique thing about this post is the original Hindi verses are explained by renowned writer Ali Sardar Jafrisahab and English translation is by Shri Rabindranath Tagore, indeed best of both “words”!   मन, तू पार उतर कहाँ जैहौ । आगे…

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એક મુકામ ……

કેમ છો ,                          અત્યારે  જ  ગુજરાતીમાં લખતાં શીખી .એના ઉત્સાહ માટે  કંઈક  તમારા બધા સાથે  share  કરું  છું. મરીઝ નો શેર છે :  હું  કોને  કોને મારી  કવિતા માં  દઉં  જગા  ! જેને  મળું   છું   એની જુદી   દાસ્તાન  છે . ગાલિબ  નો શેર છે : બસ  કિ  હું   “ગાલિબ” અસીરીમેં…

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