आज का चुनिंदा अशआर

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जश़्ने सुख़नगोई, ब्लोग के पाँचवे जन्मदिन पर…

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो ( मेयारी – qualitative) राहत इंदौरी …….. तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा तिरे सामने आसमाँ और भी हैं   (शाहीं= eagle) अल्लामा इक़बाल  ब्लोग जगत के मेरे मित्रों, अपने ब्लोग के पाँच साल पूरे होने की खुशी…

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कुछ चुने हुए शेर:​ सूर्यभानु गुप्त

जिनके नामों पे आज रस्ते हैं वे ही रस्तों की धूल थे पहले …… अन्नदाता हैं अब गुलाबों के जितने सूखे बबूल थे पहले …… मूरतें कुछ निकाल ही लाया पत्थरों तक अगर गया कोई ……. यहाँ रद्दी में बिक जाते हैं शाइर गगन ने छोड़ दी ऊँचाइयाँ हैं कथा हर ज़िंदगी की द्रोपदी-सी बड़ी…

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ग़ज़ल – दुष्यंत कुमार

कुछ चुनिंदा अशआर : सिर्फ़ शाइ’र देखता है क़हक़हों की असलियत हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं …     …    …   …   … लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो ..   ..   ..   ..    ..…

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देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ – निदा फ़ाज़ली

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ साहिल की गिली रेत पर बच्चों के खेल-सा हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ फ़ुर्सत ने आज…

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ग़ज़ल – दाग़ देहलवी

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता दाग़ देहलवी काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है मुझ को ख़बर नहीं मिरी मिट्टी कहाँ की है सुन के मिरा फ़साना उन्हें लुत्फ़ आ गया सुनता हूँ अब कि रोज़ तलब क़िस्सा-ख़्वाँ की है पैग़ाम-बर की बात पर आपस में रंज क्या मेरी…

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मुसाफ़िर – बशीर बद्र

सदियों की गठरी सर पर ले जाती है दुनिया बच्ची बन कर वापस आती है मैं दुनिया की हद से बाहर रहता हूँ घर मेरा छोटा है लेकिन जाती है दुनिया भर के शहरों का कल्चर यक्साँ आबादी, तनहाई बनती जाती है मैं शीशे के घर में पत्थर की मछली दरिया की खुश्बू, मुझमें क्यों…

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ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ सकते हैं ज़ुजाज की ये इमारत है संग-ए-ख़ारा नहीं ख़ुदी में डूबते हैं फिर उभर भी आते हैं मगर ये हौसला-ए-मर्द-ए-हेच-कारा नहीं तिरे मक़ाम को अंजुम-शनास क्या जाने कि ख़ाक-ए-ज़िदा है तू ताबा-ए-सितारा नहीं यहीं…

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दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है

दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मालूम हुआ परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा वो ये क्या जानें बिखरने में सकूँ कितना है वो जो प्यासे थे समुंदर से भी प्यासे लौटे…

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ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई

ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई जिंदगी की तड़प बढ़ाई गई आईने से बिगड़ के बैठ गए जिनकी सूरत उन्हें दिखाई गई दुश्मनों से ही बैर निभ जाए दोस्तों से तो आश्नाई गई नस्ल-दर-नस्ल इंतज़ार रहा क़स्र टूटे न बेनवाई गई ज़िंदगी का नसीब क्या कहिए एक सीता थी…

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ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा -गुलज़ार

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा रात भर तारे बातें करते हैं रात काटे कोई किधर तन्हा अपने साये से चौंक जाते हैं उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा डूबने वाले पार जा उतरे नक़्शे-पा अपने छोड़ कर तन्हा दिन गुज़रता नहीं है लोगों में रात…

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निदा फ़ाज़ली – चुनिंदा अशआर

ज़िन्दगी की सच्चाइयों को खूबसूरती से पेश करनेवाले निदा फ़ाज़ली मेरी नज़र में उजालों के , उम्मीदों के शायर है और हमारे दिलो में हमेशा ज़िन्दा रहेंगे धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो .. .. .. .. .. .. कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं…

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अहमद फ़राज़ – ख़्वाब मरते नहीं

ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसे कि जो रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएँगे जिस्म की मौत से ये भी मर जाएँगे ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब तो रौशनी हैं नवा हैं हवा हैं जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं ज़ुल्म के दोज़ख़ों से भी फुँकते नहीं रौशनी और नवा…

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अहमद फ़राज़ – चुनिंदा अशआर

चुनिंदा अशआर शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है मेरे अन्दर बारिश होती रहती है। …. मैं चुप रहा तो सारा जहाँ था मेरी तरफ हक बात की तो कोई कहाँ था मेरी तरफ। …. मैंने सितमगरों को पुकारा है खुद ‘फराज़’ वरना किसी का ध्यान कहाँ था मेरी तरफ। …. कितना आसाँ था तेरे हिज्र…

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ग़ज़ल – Ghazal – कैफ़ी आज़मी

ग़ज़ल मैं ढूँढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता नयी ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नयी ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाये नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वह तेग़ मिल गयी जिससे हुआ है क़त्ल मेरा किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता वह मेरा गाँव है वो मेरे गाँव…

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धुआँ- गुलज़ार

आँखों में जल रहा है ये बुझता नहीं धुआँ उठता तो है घटा सा, बरसता नहीं धुआँ पलकों के ढापने से भी रूकता नहीं धुआँ कितनी उँडेलीं आँखें ये बुझता नहीं धुआँ आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं महमां ये गर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ चूल्हे नहीं जलाये कि बस्ती ही जल…

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कुछ चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (2)

हम भी दरया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा ……….. जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कही मील का पत्थर नहीं देखा ………. कही यूँ भी आ मिरी आँखमें कि मिरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे,…

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मीर तक़ी मीर

मीर तक़ी मीर  (1722-23  –   1810) उर्दू के पहले सबसे बड़े शायर जिन्हें ‘ ख़ुदा-ए-सुख़न, (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है।  कुछ  अशआर दिल से रुख़सत हुई कोई ख़्वाहिश गिर्या कुछ बे-सबब नहीं आता     गिर्या- weeping, lamentation हम ख़ुदा के कभी क़ाइल ही न थे उन को देखा तो ख़ुदा याद आया  …

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चांद और सितारे – इकबाल – The Moon and The Stars

चांद और सितारे डरते-डरते दमे-सहर से तारे कह्ने लगे क़मर से नज़ारे रहे वही फ़लक पर हम थक भी गये चमक-चमक कर काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना चलना, चलना, मुदाम चलना बेताब है इस जहां की हर शै कहते है जिसे सकूं, नहीं है होगा कभी ख़त्म यह सफ़र क्या मंज़िल कभी आयेगी नज़र क्या?…

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी

मुलाक़ात यह रात उस दर्द का शजर है जो मुझसे तुझसे अज़ीमतर है अज़ीमतर है कि उसकी शाख़ों में लाख मशअल-बकफ़ सितारों के कारवां, घिर के खो गए हैं हज़ार महताब उसके साए में अपना सब नूर, रो गए हैं यह रात उस दर्द का शजर है जो मुझसे तुझसे अज़ीमतर है मगर इसी रात…

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चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (1)

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए । – – – – – – – – – – उसके लिए तो मैंने यहा तक दुआयें की मेरी तरह से कोई उसे चाहता भी हो । – – – – – — – आखो में…

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ज़िंदगी – मोहम्मद इक़बाल

बरतर अज़ अंदेशा-ए-सूदो-ज़ियां है ज़िंदगी है कभी जां और कभी तस्लीमे-जां है ज़िंदगी । तू इसे पैमाना-ए-इमरोज़ो-फ़रदा से न नाप जावदां, पैहम रवां, हर दम जवां है ज़िंदगी । अपनी दुनिया आप पैदा कर अगर ज़िंदों में है सिर्रे-आदम है ज़मीरे-कुल फ़का है ज़िंदगी । ज़िंदगानी की हक़ीक़त कोहकन के दिल से पूछ जूए-शीरो-तेशा-व-संगे-गरा है…

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