नज़्म – साहिर लुधियानवी

अश्कों में जो पाया है, वो गीतों में दिया है इस पर भी सुना है, कि ज़माने को गिला है जो तार से निकली है, वो धुन सबने सुनी है जो साज़ पे गुज़री है, वो किस दिल को पता है …… ज़िन्दगी से उन्स है हुस्न से लगाव है धड़कनों में आज भी इश़्क…

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ग़ज़ल – कुमार पाशी

अपने गिर्द-ओ-पेश का भी कुछ पता रख दिल की दुनिया तो मगर सब से जुदा रख लिख बयाज़-ए-मर्ग में हर जा अनल-हक़ और किताब-ए-ज़ीस्त में बाब-ए-ख़ुदा रख उस की रंगत और निखरेगी ख़िज़ाँ में ये ग़मों की शाख़ है इस को हरा रख आ ही जाएगी उदासी बाल खोले आज अपने दिल का दरवाज़ा खुला…

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कुमार पाशी – चुनिंदा अशआर

हवा के रंग में दुनिया पे आश्कार हुआ मैं क़ैद-ए-जिस्म से निकला तो बे-कनार हुआ आश्कार = clear, manifest, visible, व्यक्त, प्रकट, ज़ाहिर, स्पष्ट, साफ़ बे-कनार = boundless, without a shore, infinite **** पढ़ के हक़ाएक़ कहीं न अंधा हो जाऊँ मुझ को अब हो सके तो कुछ अफ़्साने दो हक़ाएक़ = facts, realities ****…

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ग़ज़ल – शहरयार

बताऊँ किस तरह अहबाब को आँखें जो ऐसी हैं कि कल पलकों से टूटी नींद की किर्चें समेटी हैं सफ़र मैंने समंदर का किया काग़ज़ की कश्ती में तमाशाई निगाहें इसलिए बेज़ार इतनी हैं ख़ुदा मेरे अता कर मुझको गोयाई कि कह पाऊँ ज़मीं पर रात-दिन जो बातें होती मैंने देखी हैं तू अपने फ़ैसले…

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તારે નામે લખું છું – કુમાર પાશી

તારે નામે લખું છું તારે નામે લખું છું: સિતારા, પતંગિયાં, આગિયા તારા રસ્તાઓ સીધા સરળ હોય એના પર છાયા હોય ઝગમગતા આકાશની અણદેખ્યા વિશ્વનાં રૂપાળાં રહસ્યો ખૂલતાં જાય તારા પર જેથી આંખોમાં તારી સ્વપ્નો હોય ઊંચેરી ઉડ્ડયનનાં તારે નામે લખું છું: આનંદ, આરજૂ, ખુશબો તારો એક એક દિવસ ખૂબસૂરત હોય, નમૂનેદાર હોય તારી કોઈ પણ…

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वक़्त – जावेद अख़्तर

ये वक़्त क्या है? ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था, तब कहाँ था कहीं तो होगा गुज़र गया है तो अब कहाँ है कहीं तो होगा कहाँ से आया किधर गया है ये कब से कब तक का सिलसिला है ये वक़्त क्या है ये वाक़ये…

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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक (A prayer needs a lifetime, an answer to obtain who can live until the time that you decide to deign) दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक (snares are spread in every…

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बशीर बद्र (रोशनी के घरौंदे)

  शाम आँखों में, आँख पानी में और पानी सराए-फ़ानी में झिलमिलाते हैं कश्तियों में दीए पुल खड़े सो रहे हैं पानी में ख़ाक हो जायेगी ज़मीन इक दिन आसमानों की आसमानी में वो हवा है उसे कहाँ ढूँढूँ आग में, ख़ाक में, कि पानी में आ पहाड़ों की तरह सामने आ इन दिनों मैं…

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चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (3)

धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे गुर्बतों का दौर है जाड़ों की शिददत है बहुत …… उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मीं रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत ……. तारों भरी पलकों की बरसायी हुई ग़ज़लें है कौन पिरोये जो बिखरायी हुई ग़ज़लें ……… पास से…

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इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का – जिगर मुरादाबादी

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है दिल संग-ए-मलामत का हर-चंद निशाना है दिल फिर भी मिरा दिल है दिल ही तो ज़माना है हम इश्क़ के मारों का…

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Sunshine – Gulzar

Sunshine A golden sun shines on floating islands in the cosmos. The rarefied mist has slipped aside. Your face quivers in my palms. The morning cupped in my hands. A soft refulgence courses through my whole being. I have drunk in the drops of light, which had slipped from your radiant soul and suffused your…

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A Moment in Time – एक लम्हा

Life is the name given to a few moments, and In but one of those fleeting moments Two eyes meet eloquently Looking up from a cup of tea, and Enter the heart piercingly And say, Today do not speak I’ll be silent too Let’s just sit thus. Holding each other’s hand United by this gift…

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मिली हवाओं में उड़ने की – वसीम बरेलवी

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो कहाँ था बस में मेरे उस को रोकना यारो मेरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो तमाम शहर ही जिस की…

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ग़ज़ल – इन्दु श्रीवास्तव

    आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ रुदादे-सफ़र पूछ मगर रास्ता न पूछ गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले सहरा कहाँ था और कहाँ ज़लज़ला न पूछ वाँ से चले हैं जबसे मुसलसल नशे में है ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ वाक़िफ़ नहीं है…

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रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… आस्मान बुझता ही नहीं, और दरिया रौशन रहता है इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का जैसे रात में ‘प्लेन’ से रौशन शहर दिखाई देते हैं! पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के…

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उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता

उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता हमेशा हो सितारा हम-सफ़र आसाँ नहीं होता जो आँखों ओट है चेहरा उसी को देख कर जीना ये सोचा था कि आसाँ है मगर आसाँ नहीं होता बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैं सहर की राह तकना ता-सहर आसाँ नहीं होता अँधेरी कासनी रातें यहीं से हो…

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जब साज़ की लय बदल गई थी

जब साज़ की लय बदल गई थी वो रक़्स की कौन सी घड़ी थी रक़्स- dance अब याद नहीं कि ज़िंदगी में मैं आख़िरी बार कब हँसी थी जब कुछ भी न था यहाँ पे मा-क़ब्ल दुनिया किस चीज़ से बनी थी मा-क़ब्ल- before preceding, former मुट्ठी में तो रंग थे हज़ारों बस हाथ से…

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ग़ज़ल – मुसव्विर सब्ज़वारी

कोई ख़्वाब सर से परे रहा ये सफ़र सराब-ए-सफ़र रहा मैं शनाख़्त अपनी गँवा चुका गई सूरतों की तलाश में सराब-ए-सफ़र – mirage of journey, शनाख़्त – recognition, identification, knowledge इक कुतुब-ख़ाना हूँ अपने दरमियाँ खोले हुए सब किताबें सफ़्हा-ए-हर्फ़-ए-ज़ियाँ खोले हुए कुतुब-ख़ाना – library, सफ़्हा-ए-हर्फ़-ए-ज़ियाँ – page of wordloss अपने होने का कुछ एहसास…

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ग़ज़ल – दाग़ देहलवी

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता दाग़ देहलवी काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है मुझ को ख़बर नहीं मिरी मिट्टी कहाँ की है सुन के मिरा फ़साना उन्हें लुत्फ़ आ गया सुनता हूँ अब कि रोज़ तलब क़िस्सा-ख़्वाँ की है पैग़ाम-बर की बात पर आपस में रंज क्या मेरी…

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औरत

औरत उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे उठ मेरी जान! मेरे साथ…

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