रात – नेहल

रातके माथे पर जो बल पडे है, चाँदके सफ़रका बयाँ है। उजालोंके सूरज तो निकले है कबसे, ये कौनसा चिलमन दर्मियाँ है। – – – – – – —- – – – आओ एक आरजूकी तिली जलाओ, कि रात आज काफी जगी हुई है। कहेदो हवाओ से चूपचाप गुजरे, कि निंदकी चिठ्ठी कहीं उड ग्ई…

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