सुकून

कल रात जब मैने बिना नींद के पथराइ आँखोसे देखा । आधा अधूरासा चाँद खिला था मैले धूंधले आसमाँ के माथे पर । पेड चुपचाप से खडे थे एक पत्ता भी हिलाये बिना सुन रहे थे; एक-दूजे की गोद मे लेटे मकानो की फुसफुसाहट! एक हवाकी लहर जो गूजरा करती थी हमारे दरमियाँ आज न…

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