चुनिंदा अशआर : ज़ेहरा निगाह

मय-ए-हयात में शामिल है तल्ख़ी-ए-दौराँ जभी तो पी के तरसते हैं बे-ख़ुदी के लिए मय-ए-हयात = wine of existence, तल्ख़ी-ए-दौराँ = hard times … औरत के ख़ुदा दो हैं हक़ीक़ी ओ मजाज़ी पर उस के लिए कोई भी अच्छा नहीं होता हक़ीक़ी = real, actual मजाज़ी = metaphorical, allusive … टूटे-फूटे लफ़्ज़ों के कुछ रंग…

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गज़ल : ज़ेहरा निगाह

My favourites are 3’rd, 5’th & 6’th sher. छलक रही है मय-ए-नाब तिश्नगी के लिए सँवर रही है तिरी बज़्म बरहमी के लिए नहीं नहीं हमें अब तेरी जुस्तुजू भी नहीं तुझे भी भूल गए हम तिरी ख़ुशी के लिए जो तीरगी में हुवैदा हो क़ल्ब-ए-इंसाँ से ज़िया-नवाज़ वो शोला है तीरगी के लिए कहाँ…

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