A Moment in Time – एक लम्हा

Life is the name given to a few moments, and In but one of those fleeting moments Two eyes meet eloquently Looking up from a cup of tea, and Enter the heart piercingly And say, Today do not speak I’ll be silent too Let’s just sit thus. Holding each other’s hand United by this gift…

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मिली हवाओं में उड़ने की – वसीम बरेलवी

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो कहाँ था बस में मेरे उस को रोकना यारो मेरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो तमाम शहर ही जिस की…

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ग़ज़ल – इन्दु श्रीवास्तव

    आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ रुदादे-सफ़र पूछ मगर रास्ता न पूछ गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले सहरा कहाँ था और कहाँ ज़लज़ला न पूछ वाँ से चले हैं जबसे मुसलसल नशे में है ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ वाक़िफ़ नहीं है…

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रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… आस्मान बुझता ही नहीं, और दरिया रौशन रहता है इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का जैसे रात में ‘प्लेन’ से रौशन शहर दिखाई देते हैं! पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के…

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उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता

उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता हमेशा हो सितारा हम-सफ़र आसाँ नहीं होता जो आँखों ओट है चेहरा उसी को देख कर जीना ये सोचा था कि आसाँ है मगर आसाँ नहीं होता बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैं सहर की राह तकना ता-सहर आसाँ नहीं होता अँधेरी कासनी रातें यहीं से हो…

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जब साज़ की लय बदल गई थी

जब साज़ की लय बदल गई थी वो रक़्स की कौन सी घड़ी थी रक़्स- dance अब याद नहीं कि ज़िंदगी में मैं आख़िरी बार कब हँसी थी जब कुछ भी न था यहाँ पे मा-क़ब्ल दुनिया किस चीज़ से बनी थी मा-क़ब्ल- before preceding, former मुट्ठी में तो रंग थे हज़ारों बस हाथ से…

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ग़ज़ल – मुसव्विर सब्ज़वारी

कोई ख़्वाब सर से परे रहा ये सफ़र सराब-ए-सफ़र रहा मैं शनाख़्त अपनी गँवा चुका गई सूरतों की तलाश में सराब-ए-सफ़र – mirage of journey, शनाख़्त – recognition, identification, knowledge इक कुतुब-ख़ाना हूँ अपने दरमियाँ खोले हुए सब किताबें सफ़्हा-ए-हर्फ़-ए-ज़ियाँ खोले हुए कुतुब-ख़ाना – library, सफ़्हा-ए-हर्फ़-ए-ज़ियाँ – page of wordloss अपने होने का कुछ एहसास…

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ग़ज़ल – दाग़ देहलवी

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता दाग़ देहलवी काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है मुझ को ख़बर नहीं मिरी मिट्टी कहाँ की है सुन के मिरा फ़साना उन्हें लुत्फ़ आ गया सुनता हूँ अब कि रोज़ तलब क़िस्सा-ख़्वाँ की है पैग़ाम-बर की बात पर आपस में रंज क्या मेरी…

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औरत

औरत उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे उठ मेरी जान! मेरे साथ…

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मुसाफ़िर – बशीर बद्र

सदियों की गठरी सर पर ले जाती है दुनिया बच्ची बन कर वापस आती है मैं दुनिया की हद से बाहर रहता हूँ घर मेरा छोटा है लेकिन जाती है दुनिया भर के शहरों का कल्चर यक्साँ आबादी, तनहाई बनती जाती है मैं शीशे के घर में पत्थर की मछली दरिया की खुश्बू, मुझमें क्यों…

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ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ सकते हैं ज़ुजाज की ये इमारत है संग-ए-ख़ारा नहीं ख़ुदी में डूबते हैं फिर उभर भी आते हैं मगर ये हौसला-ए-मर्द-ए-हेच-कारा नहीं तिरे मक़ाम को अंजुम-शनास क्या जाने कि ख़ाक-ए-ज़िदा है तू ताबा-ए-सितारा नहीं यहीं…

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दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है

दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मालूम हुआ परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा वो ये क्या जानें बिखरने में सकूँ कितना है वो जो प्यासे थे समुंदर से भी प्यासे लौटे…

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नज़्म – गुलज़ार

ख़लाओं में तैरते जज़ीरों पे चम्पई धूप देख कैसे बरस रही है महीन कोहरा सिमट रहा है हथेलियों में अभी तलक तेरे नर्म चेहरे का लम्स एेसे छलक रहा है कि जैसे सुबह को ओक में भर लिया हो मैंने बस एक मध्दम-सी रोशनी मेरे हाथों-पैरों में बह रही है तेरे लबों पर ज़बान रखकर…

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ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई

ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई जिंदगी की तड़प बढ़ाई गई आईने से बिगड़ के बैठ गए जिनकी सूरत उन्हें दिखाई गई दुश्मनों से ही बैर निभ जाए दोस्तों से तो आश्नाई गई नस्ल-दर-नस्ल इंतज़ार रहा क़स्र टूटे न बेनवाई गई ज़िंदगी का नसीब क्या कहिए एक सीता थी…

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ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा -गुलज़ार

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा रात भर तारे बातें करते हैं रात काटे कोई किधर तन्हा अपने साये से चौंक जाते हैं उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा डूबने वाले पार जा उतरे नक़्शे-पा अपने छोड़ कर तन्हा दिन गुज़रता नहीं है लोगों में रात…

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अहमद फ़राज़ – ख़्वाब मरते नहीं

ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसे कि जो रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएँगे जिस्म की मौत से ये भी मर जाएँगे ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब तो रौशनी हैं नवा हैं हवा हैं जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं ज़ुल्म के दोज़ख़ों से भी फुँकते नहीं रौशनी और नवा…

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