धूप की भाषा : श्रीनरेश मेहता

धूप की भाषा-सी खिड़की में मत खड़ी होओ प्रिया! शॉल-सा कंधों पर पड़ा यह फाल्गुन चैत्र-सा तपने लगेगा! केश सुखा लेने के बाद ढीला जूड़ा बना तुम तो लौट जाओगी, परंतु तुम्हें क्या पता, कि तुम— इस गवाक्ष आकाश और बालुकणों जैसे रिसते इस नि:शब्द समय से कहीं अधिक मुझमें एक मर्म एक प्रसंग बन…

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