ग़ज़ल – शहरयार

बताऊँ किस तरह अहबाब को आँखें जो ऐसी हैं कि कल पलकों से टूटी नींद की किर्चें समेटी हैं सफ़र मैंने समंदर का किया काग़ज़ की कश्ती में तमाशाई निगाहें इसलिए बेज़ार इतनी हैं ख़ुदा मेरे अता कर मुझको गोयाई कि कह पाऊँ ज़मीं पर रात-दिन जो बातें होती मैंने देखी हैं तू अपने फ़ैसले…

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दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है

दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मालूम हुआ परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा वो ये क्या जानें बिखरने में सकूँ कितना है वो जो प्यासे थे समुंदर से भी प्यासे लौटे…

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