नज़्म – साहिर लुधियानवी

अश्कों में जो पाया है, वो गीतों में दिया है इस पर भी सुना है, कि ज़माने को गिला है जो तार से निकली है, वो धुन सबने सुनी है जो साज़ पे गुज़री है, वो किस दिल को पता है …… ज़िन्दगी से उन्स है हुस्न से लगाव है धड़कनों में आज भी इश़्क…

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ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई

ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई जिंदगी की तड़प बढ़ाई गई आईने से बिगड़ के बैठ गए जिनकी सूरत उन्हें दिखाई गई दुश्मनों से ही बैर निभ जाए दोस्तों से तो आश्नाई गई नस्ल-दर-नस्ल इंतज़ार रहा क़स्र टूटे न बेनवाई गई ज़िंदगी का नसीब क्या कहिए एक सीता थी…

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