सारा दिन : मृगतृष्णा

तुम्हारी आँखें कुछ बोलती रहीं आज सारा दिन सूरज मेरे कंधे पर सवार रहा आज सारा दिन खूँटी से टँगे कोट में सारी रात चाय की एक चुस्की ठिठुरती रही दीवार पर टँगे नक़्शे से आज सारा दिन एक छूटी हुई ट्रेन और तुम्हारा शहर किसी जंगली बिल्ली की आँख-सा चमकता रहा आज सारा दिन…

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