कबीर बानी-Poems of Kabir

मुरली बजत अखंड सदा से, तहाँ प्रेम झनकारा है।
प्रेम-हद तजी जब भाई, सत लोक की हद पुनि आई।
उठत सुगंध महा अधिकाई, जाको वार न पारा है।
कोटि भान राग को रूपा, बीन सत-धुन बजै अनूपा ।।

यह मुरली सदा से निरंतर बज रही है, और प्रेम इसकी ध्वनी है। जब मनुष्य प्रेम की सीमाओं से पार निकल जाता है तो सत्यलोक की सीमा आती है। वहाँ सुगंध का अपार विस्तार है। यह राग करोड़ों सूर्यो का रूप धारण कर रहा है। वीणा पर सत्य की अनुपम धुन बज रही है।

कबीर बानी
अली सरदार जाफ़री

The Flute of the infinite is played without ceasing, and its sound is love:
When love renounces all limits, it reaches truth.
How widely the fragrance spreads! It has no end, nothing stands in its way.
The form of this melody is bright like a million suns:
incomparably sounds the veena, the veena of the notes of truth.

by Rabindranath Tagore

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Poems of Kabir- कबीर बानी

 

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कबीर बानी

सन्तो, सहज समाधि भली।
साँईते मिलन भयो जा दिन तें, सुरत न अन्त चली।।
आँख न मूँदूँ काम न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ।
खुले नैन मैं हँस हँस देखूँ, सुन्दर रूप निहारूँ।।
कहूँ सो नाम सुनूँ सो सुमिरन, जो कछु करूँ सो पूजा।
गिरह-उद्यान एकसम देखूँ, भाव मिटाऊँ दूजा।।
जहँ जहँ जाऊँ सोई परिकरमा, जो कछु करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दण्डवत, पूजूँ और न देवा।।
शब्द निरन्तर मनुआ राता, मलिन बचन का त्यागी।
ऊठत-बैठत कबहुँ न बिसरै, ऐसी तारी लागी।।
कहैं कबीर यह उन्मुनि रहनी, सो परगट कर गाई।
सुख-दुख के इक परे परम सुख, तेहि में रहा समाई।।

संतो, सहज समाधि ही भली है। जब से साँई से मिलन हो गया है तब से मैंने किसी और से लौ नहीं लगायी है। न आँख बंद करता हूँ न कान, और न शरीर को कष्ट पहुँचाता हूँ। खुली आँखों से हँस-हँसकर उसका सुंदर रूप देखता हूँ। जो बोलता हूँ वह नाम है, जो सुनता हूँ वही सुमिरन है, जो करता हूँ वही पूजा है। मेरे लिए घर और उद्यान सब समान हैं, मेरे लिए उनमें कोई अंतर बाक़ी नहीं है। में जहाँ भी जाऊँ वही मेरे लिए परिक्रमा है और जो कुछ करूँ वही उसकी सेवा है। जब मैं सोता हूँ तब वही मेरी दण्डवत है, मैं किसी और देवता की पूजा नहीं करता। मेरा मन निरन्तर उसी के गीत गाता है और कोई कुशब्द मेरी ज़बान पर नहीं आता। उठते-बैठते उसकी याद ताज़ा रहती है और इस राग का क्रम टूटने नहीं पाता। कबीर कहते हैं कि मेरे ह्रदय में जो उन्माद था उसे मैंने प्रगट कर दिया है। मैं परम सुख की उस अवस्था में पहुँच गया हूँ जो सुख और दुख दोनों से परे है।

कबीर बानी -अली सरदार जाफ़री

 

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Poems by KABIR [1440-1518]

 

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My friends, today I want to share works of my favorite poet Kabir. The unique thing about this post is the original Hindi verses are explained by renowned writer Ali Sardar Jafrisahab and English translation is by Shri Rabindranath Tagore, indeed best of both “words”!

 

मन, तू पार उतर कहाँ जैहौ ।
आगे पंथी पंथ न कोई, कूच-मुकाम न पैहौ ।
नहिं तहॆँ नीर, नाव नहि खेवट, ना गुन खैचनहारा ।
धरनी-गगन-कल्प कछु नाहीं, ना कछु वार न पारा ।
नहिं तन, नहिं मन, नहिं अपनपौ सुन्न में सुद्ध न पैहौ ।
बलीवान होय पैठो घट में, बाहीं ठौरे होइहौ ।
बार हि बार बिचार देख मन, अंत कहूँ मत जैहौ ।
कहैं कबीर सब छाडि कलपना, ज्यों के त्यों ठहरैहौ ।

ऐ मेरे दिल,तू पार उतरकर कहाँ जायेगा । तेरे सामने न तो कोई राही है न कोई राह । न कूच है न पडाव । वहाँ न तो पानी है, न कोई नाव, न खेचनहारा । नाव को बांधने के लिए रस्सी भी नहीं है और कोई उसे किनारे खींचने वाला भी नहीं है । पॄथ्वी, आकाश, कल्प [काल] कुछ भी नहीं है ।आर-पार कुछ नहीं है– न तन है न मन, न कोई ऐसी जगह जहाँ आत्मा की प्यास बुझ सके । शून्य के निर्जन विस्तार में कुछ भी तो नहीं है । हिम्मत से काम ले और अपने घट में प्रवेश कर वहीं कोई ठौर-ठिकाना मिलेगा । अच्छी तरह सोच ले, ए मन, कहीं और न जाना । कबीर कहते है कि कल्पना को छोड-छाड कर अपने अस्तित्व में लीन हो जा ।
कबीर बानी -अली सरदार जाफ़री

To what shore would you cross, O my heart? There is no traveler before you, there is no road:
Where is the movement, where is the rest, on that shore?
There is no water; no boat, no boatman, is there;
There is not so much as a rope to tow the boat, nor a man to draw it.
No earth, no sky, no time, no thing, is there: no shore, no ford!
There, there is neither body nor mind: and where is the place that shall still the thirst of the soul?
You shall find naught in that emptiness.
Be strong, and enter into your own body: for there your foothold is firm.
Consider it well, O my heart! go not elsewhere.
Kabir says: ‘Put all imaginations away, and stand fast in that which you are.’

POEMS OF KABIR -Rabindranath Tagore