कबीर बानी-Poems of Kabir

मुरली बजत अखंड सदा से, तहाँ प्रेम झनकारा है। प्रेम-हद तजी जब भाई, सत लोक की हद पुनि आई। उठत सुगंध महा अधिकाई, जाको वार न पारा है। कोटि भान राग को रूपा, बीन सत-धुन बजै अनूपा ।। यह मुरली सदा से निरंतर बज रही है, और प्रेम इसकी ध्वनी है। जब मनुष्य प्रेम की…

Poems of Kabir- कबीर बानी

  कबीर बानी सन्तो, सहज समाधि भली। साँईते मिलन भयो जा दिन तें, सुरत न अन्त चली।। आँख न मूँदूँ काम न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ। खुले नैन मैं हँस हँस देखूँ, सुन्दर रूप निहारूँ।। कहूँ सो नाम सुनूँ सो सुमिरन, जो कछु करूँ सो पूजा। गिरह-उद्यान एकसम देखूँ, भाव मिटाऊँ दूजा।। जहँ जहँ…

Poems by KABIR [1440-1518]

  My friends, today I want to share works of my favorite poet Kabir. The unique thing about this post is the original Hindi verses are explained by renowned writer Ali Sardar Jafrisahab and English translation is by Shri Rabindranath Tagore, indeed best of both “words”!   मन, तू पार उतर कहाँ जैहौ । आगे…