ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ सकते हैं ज़ुजाज की ये इमारत है संग-ए-ख़ारा नहीं ख़ुदी में डूबते हैं फिर उभर भी आते हैं मगर ये हौसला-ए-मर्द-ए-हेच-कारा नहीं तिरे मक़ाम को अंजुम-शनास क्या जाने कि ख़ाक-ए-ज़िदा है तू ताबा-ए-सितारा नहीं यहीं…

चांद और सितारे – इकबाल – The Moon and The Stars

चांद और सितारे डरते-डरते दमे-सहर से तारे कह्ने लगे क़मर से नज़ारे रहे वही फ़लक पर हम थक भी गये चमक-चमक कर काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना चलना, चलना, मुदाम चलना बेताब है इस जहां की हर शै कहते है जिसे सकूं, नहीं है होगा कभी ख़त्म यह सफ़र क्या मंज़िल कभी आयेगी नज़र क्या?…

ज़िंदगी – मोहम्मद इक़बाल

बरतर अज़ अंदेशा-ए-सूदो-ज़ियां है ज़िंदगी है कभी जां और कभी तस्लीमे-जां है ज़िंदगी । तू इसे पैमाना-ए-इमरोज़ो-फ़रदा से न नाप जावदां, पैहम रवां, हर दम जवां है ज़िंदगी । अपनी दुनिया आप पैदा कर अगर ज़िंदों में है सिर्रे-आदम है ज़मीरे-कुल फ़का है ज़िंदगी । ज़िंदगानी की हक़ीक़त कोहकन के दिल से पूछ जूए-शीरो-तेशा-व-संगे-गरा है…