Meer Taqi Meer मीर तक़ी मीर

इश्क़ में जी को सबरो-ताब कहां उससे आंखें लगें तो ख्वाब कहां हस्ती अपनी है बीच में पर्दा हम न होवें तो फिर हिजाब1कहां गिरिया-ए-शब2 से सुर्ख हैं आंखें मुझ बलानोश को शराब कहां इश्क़ है आशिक़ों के जलने को ये जहन्नुम3 में है अज़ाब4 कहां इश्क़ का घर है मीर से आबाद ऐसे फिर…

Read More

जश़्ने सुख़नगोई, ब्लोग के पाँचवे जन्मदिन पर…

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो ( मेयारी – qualitative) राहत इंदौरी …….. तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा तिरे सामने आसमाँ और भी हैं   (शाहीं= eagle) अल्लामा इक़बाल  ब्लोग जगत के मेरे मित्रों, अपने ब्लोग के पाँच साल पूरे होने की खुशी…

Read More

मीर तक़ी मीर

मीर तक़ी मीर  (1722-23  –   1810) उर्दू के पहले सबसे बड़े शायर जिन्हें ‘ ख़ुदा-ए-सुख़न, (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है।  कुछ  अशआर दिल से रुख़सत हुई कोई ख़्वाहिश गिर्या कुछ बे-सबब नहीं आता     गिर्या- weeping, lamentation हम ख़ुदा के कभी क़ाइल ही न थे उन को देखा तो ख़ुदा याद आया  …

Read More