मधुशाला : हरिवंशराय ‘ बच्चन ‘

मधुशाला : कुछ उद्धरण मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्या बनाता हूँ हाला भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला; उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ; अपने ही में हूँ मैं साक़ी, पीनेवाला, मधुशाला | 5 प्रति रसाल तरु साक़ी-सा है, प्रति मंजरिका है प्याला, छलक रही है जिसके…

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गीत मेरे : हरिवंशराय बच्चन

 गीत मेरे गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन। एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ,वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ,छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन,गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुँ,और अपने कंठ पर तुझको सँवारूँ,कह उठे संसार, आया ज्‍योति का क्षण,गीत मेरे, देहरी का…

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