Amen- कुछ और नज़्में

Amen Give everything away— Ideas, breath, vision, thoughts. Peel off words from the lips, and sounds from the tongue. Wipe off the lines from the palms. Give up your ego, for you are not yourself. Take off the body beautiful from your soul. Finish your prayers, say Amen! And surrender the soul. – Gulzar (…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… आस्मान बुझता ही नहीं, और दरिया रौशन रहता है इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का जैसे रात में ‘प्लेन’ से रौशन शहर दिखाई देते हैं! पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के…

काँच के पीछे चाँद भी था – गुलज़ार

काँच के पीछे चाँद भी था काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी तीनों थे हम, वो भी थे, और मैं भी था, तनहाई भी यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं सोंधी-सोंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी दो-दो शक्लें दिखती हैं इस बहके-से आईने में…

नज़्म – गुलज़ार

ख़लाओं में तैरते जज़ीरों पे चम्पई धूप देख कैसे बरस रही है महीन कोहरा सिमट रहा है हथेलियों में अभी तलक तेरे नर्म चेहरे का लम्स एेसे छलक रहा है कि जैसे सुबह को ओक में भर लिया हो मैंने बस एक मध्दम-सी रोशनी मेरे हाथों-पैरों में बह रही है तेरे लबों पर ज़बान रखकर…

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा -गुलज़ार

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा रात भर तारे बातें करते हैं रात काटे कोई किधर तन्हा अपने साये से चौंक जाते हैं उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा डूबने वाले पार जा उतरे नक़्शे-पा अपने छोड़ कर तन्हा दिन गुज़रता नहीं है लोगों में रात…

Neglected Poems – Gulzar

A Poem Perched On a Moment A poem perched on a moment Imprisoned in a butterfly net Then its wings cut off To keep it pinned in an album: If this is not injustice, what is? Entangled in the paper the moments are mummified Only the colours of the poem remain on my fingertips! _…

धुआँ- गुलज़ार

आँखों में जल रहा है ये बुझता नहीं धुआँ उठता तो है घटा सा, बरसता नहीं धुआँ पलकों के ढापने से भी रूकता नहीं धुआँ कितनी उँडेलीं आँखें ये बुझता नहीं धुआँ आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं महमां ये गर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ चूल्हे नहीं जलाये कि बस्ती ही जल…

रात पश्मीने की – गुलज़ार

    ऐसे आई है तेरी याद अचानक जैसे पगडंडी कोई पेड़ों से निकले इक घने माज़ी के जंगल में मिली हो । । : – : – : – : – : – : – : – : जिस्म के खोल के अन्दर ढूंढ़ रहा हूँ और कोई एक जो मैं हूँ , एक…