नज़्म – गुलज़ार

ख़लाओं में तैरते जज़ीरों पे चम्पई धूप देख कैसे बरस रही है
महीन कोहरा सिमट रहा है
हथेलियों में अभी तलक तेरे नर्म चेहरे का लम्स एेसे छलक रहा है
कि जैसे सुबह को ओक में भर लिया हो मैंने
बस एक मध्दम-सी रोशनी मेरे हाथों-पैरों में बह रही है

तेरे लबों पर ज़बान रखकर
मैं नूर का वह हसीन क़तरा भी पी गया हूँ
जो तेरी उजली धुली हुई रूह से फिसलकर तेरे लबों पर ठहर गया था

ख़लाओं – शून्य , जज़ीरों – द्वीप ,  लम्स – स्पर्श

गुलज़ार ( कुछ और नज़्में )

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ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा -गुलज़ार

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा
काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

रात भर तारे बातें करते हैं
रात काटे कोई किधर तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा

डूबने वाले पार जा उतरे
नक़्शे-पा अपने छोड़ कर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गया किधर तन्हा
गुलज़ार
यार जुलाहे….सम्पादनः यतीन्द्र मिश्र

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Neglected Poems – Gulzar

A Poem Perched On a Moment

A poem perched on a moment
Imprisoned in a butterfly net
Then its wings cut off
To keep it pinned in an album:
If this is not injustice, what is?

Entangled in the paper the moments are mummified
Only the colours of the poem remain on my fingertips!
_ Gulzar
From Neglected Poems
Translated by Pavan K Varma

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लम्हों पर बैठी नज़्मों को

लम्हों पर बैठी नज़्मों को
तितली जाल में बंद कर लेना
फिर, काट के पर उन नज़्मों को
अल्बम में ‘पिन’ करते रहना
जुल्म नहीं तो और क्या है?

लम्हे काग़ज़ पर गिर के ममियाये जाते है
नज़्मों के रंग रह जाते है पोरों पर!!
– गुलज़ार

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धुआँ- गुलज़ार

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आँखों में जल रहा है ये बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा, बरसता नहीं धुआँ

पलकों के ढापने से भी रूकता नहीं धुआँ
कितनी उँडेलीं आँखें ये बुझता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
महमां ये गर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ

चूल्हे नहीं जलाये कि बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये है अब उठता नहीं धुआँ

काली लकीरें खींच रहा है फ़िज़ाओं में
बौरा गया है कुछ भी तो खुलता नहीं धुआँ

आँखों के पोंछने से लगा आग का पता
यूं चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में
थोड़ासा आ के फूंक दो, उड़ता नहीं धुआँ
गुलज़ार
( रात पश्मीने की)

रात पश्मीने की – गुलज़ार

 

 

ऐसे आई है तेरी याद अचानक
जैसे पगडंडी कोई पेड़ों से निकले

इक घने माज़ी के जंगल में मिली हो । ।
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जिस्म के खोल के अन्दर ढूंढ़ रहा हूँ और कोई
एक जो मैं हूँ , एक जो कोई और चमकता है

एक मयान में दो तलवारें कैसे रहती है
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जिस्म और ज़ाँ टटोल कर देखें
ये पिटारी भी खोल कर देखें

टूटा फूटा अगर ख़ुदा निकले-!
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तमाम सफ़हे क़िताबों के फड़फड़ाने लगे
हवा धकेल के दरवाज़ा आ गई घर में !

कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो !!
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आँखो और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं
क्या तुम ने उड़ती देखी है, रेत कभी तन्हाई की
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किस में रखी है सुबह की धड़कन
गुन्चा गुन्चा टटोलती है रात
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गुलों को सुनना ज़रा तुम सदायें भेजी है
गुलों के हाथ बहुत सी दुआयें भेजी है

जो आफ़ताब कभी भी गुरुब होता नहीं
वो दिल है मेरा उसी की शु’आयें भेजी है

तुम्हारी ख़ुश्क सी आँखें भली नहीं लगती
वह सारी यादें जो तुमको रुलायें भेजी है

स्याह रंग , चमकती हुई किनारी है
पहन लो अच्छी लगेंगी घटायें भेजी है

तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते है
सज़ायें भेज दो हम ने खतायें भेजी है

अकेला पत्ता हवा में बहुत बुलंद उड़ा
ज़मी से पाँव उठाओ, हवायें भेजी है

-गुलज़ार [ रात पश्मिने की]