गांधीजी के जन्मदिन पर : दुष्यन्त कुमार

गांधीजी के जन्मदिन पर मैं फिर जनम लूंगाफिर मैंइसी जगह आउंगाउचटती निगाहों की भीड़ मेंअभावों के बीचलोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगालँगड़ाकर चलते हुए पावों कोकंधा दूँगागिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता कोबाँहों में उठाऊँगा । इस समूह मेंइन अनगिनत अचीन्ही आवाज़ों मेंकैसा दर्द हैकोई नहीं सुनता !पर इन आवाजों कोऔर इन कराहों कोदुनिया सुने मैं ये…

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अभिव्यक्ति का प्रश्न – दुष्यंत कुमार ( સરળ ગુજરાતી સાર સાથે )

अभिव्यक्ति का प्रश्न प्रश्न अभिव्यक्ति का है, मित्र! किसी मर्मस्पर्शी शब्द से या क्रिया से, मेरे भावों, अभावों को भेदो प्रेरणा दो! यह जो नीला ज़हरीला घुँआ भीतर उठ रहा है, यह जो जैसे मेरी आत्मा का गला घुट रहा है, यह जो सद्य-जात शिशु सा कुछ छटपटा रहा है, यह क्या है? क्या है…

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ग़ज़ल – दुष्यंत कुमार

कुछ चुनिंदा अशआर : सिर्फ़ शाइ’र देखता है क़हक़हों की असलियत हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं …     …    …   …   … लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो ..   ..   ..   ..    ..…

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एक आशीर्वाद – दुष्यंत कुमार

जा तेरे स्वप्न बड़े हों। भावना की गोद से उतर कर जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें। चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये रूठना मचलना सीखें। हँसें मुस्कुराएँ गाएँ। हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें उँगली जलाएँ। अपने पाँव पर खड़े हों। जा तेरे स्वप्न बड़े हों। – दुष्यंत कुमार source: kavitakosh.org

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