दिन ढले की बारिश : धर्मवीर भारती

बारिश दिन ढले कीहरियाली-भीगी, बेबस, गुमसुमतुम हो और,और वही बलखाई मुद्राकोमल शंखवाले गले कीवही झुकी-मुँदी पलक सीपी में खाता हुआ पछाड़बेज़बान समन्दर अन्दरएक टूटा जलयानथकी लहरों से पूछता है पतादूर- पीछे छूटे प्रवालद्वीप का बांधूंगा नहींसिर्फ़ काँपती उंगलियों से छू लूँ तुम्हेंजाने कौन लहरें ले आई हैंजाने कौन लहरें वापिस बहा ले जाएंगी मेरी इस…

Read More

सृजन का शब्द

आरम्भ में केवल शब्द थाकिन्तु उसकी सार्थकता थी श्रुति बनने मेंकि वह किसी से कहा जाय मौन को टूटना अनिवार्य थाशब्द का कहा जाना थाताकि प्रलय का अराजक तिमिर व्यवस्थित उजियाले में रूपान्तरित हो ताकि रेगिस्तानगुलाबों की क्यारी बन जाय शब्द का कहा जाना अनिवार्य था।आदम की पसलियों के घाव से इवा के मुक्त अस्तित्व की प्रतिष्ठा के लिएशब्द को…

Read More