साबुत आईने : धर्मवीर भारती

साबुत आईने इस डगर पर मोह सारे तोड़ले चुका कितने अपरिचित मोड़ पर मुझे लगता रहा हर बारकर रहा हूँ आइनों को पार दर्पणों में चल रहा हूँ मैंचौखटों को छल रहा हूँ मैं सामने लेकिन मिली हर बारफिर वही दर्पण मढ़ी दीवार फिर वही झूठे झरोखे द्वारवही मंगल चिन्ह वन्दनवार किन्तु अंकित भीत पर,…

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दिन ढले की बारिश : धर्मवीर भारती

बारिश दिन ढले कीहरियाली-भीगी, बेबस, गुमसुमतुम हो और,और वही बलखाई मुद्राकोमल शंखवाले गले कीवही झुकी-मुँदी पलक सीपी में खाता हुआ पछाड़बेज़बान समन्दर अन्दरएक टूटा जलयानथकी लहरों से पूछता है पतादूर- पीछे छूटे प्रवालद्वीप का बांधूंगा नहींसिर्फ़ काँपती उंगलियों से छू लूँ तुम्हेंजाने कौन लहरें ले आई हैंजाने कौन लहरें वापिस बहा ले जाएंगी मेरी इस…

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सृजन का शब्द

आरम्भ में केवल शब्द थाकिन्तु उसकी सार्थकता थी श्रुति बनने मेंकि वह किसी से कहा जाय मौन को टूटना अनिवार्य थाशब्द का कहा जाना थाताकि प्रलय का अराजक तिमिर व्यवस्थित उजियाले में रूपान्तरित हो ताकि रेगिस्तानगुलाबों की क्यारी बन जाय शब्द का कहा जाना अनिवार्य था।आदम की पसलियों के घाव से इवा के मुक्त अस्तित्व की प्रतिष्ठा के लिएशब्द को…

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