बशीर बद्र (रोशनी के घरौंदे)

  शाम आँखों में, आँख पानी में और पानी सराए-फ़ानी में झिलमिलाते हैं कश्तियों में दीए पुल खड़े सो रहे हैं पानी में ख़ाक हो जायेगी ज़मीन इक दिन आसमानों की आसमानी में वो हवा है उसे कहाँ ढूँढूँ आग में, ख़ाक में, कि पानी में आ पहाड़ों की तरह सामने आ इन दिनों मैं…

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चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (3)

धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे गुर्बतों का दौर है जाड़ों की शिददत है बहुत …… उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मीं रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत ……. तारों भरी पलकों की बरसायी हुई ग़ज़लें है कौन पिरोये जो बिखरायी हुई ग़ज़लें ……… पास से…

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मुसाफ़िर – बशीर बद्र

सदियों की गठरी सर पर ले जाती है दुनिया बच्ची बन कर वापस आती है मैं दुनिया की हद से बाहर रहता हूँ घर मेरा छोटा है लेकिन जाती है दुनिया भर के शहरों का कल्चर यक्साँ आबादी, तनहाई बनती जाती है मैं शीशे के घर में पत्थर की मछली दरिया की खुश्बू, मुझमें क्यों…

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कुछ चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र

हम भी दरया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा ……….. जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कही मील का पत्थर नहीं देखा ………. कही यूँ भी आ मिरी आँखमें कि मिरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे,…

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चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए । – – – – – – – – – – उसके लिए तो मैंने यहा तक दुआयें की मेरी तरह से कोई उसे चाहता भी हो । – – – – – — – आखो में…

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