मुसाफ़िर – बशीर बद्र

सदियों की गठरी सर पर ले जाती है
दुनिया बच्ची बन कर वापस आती है

मैं दुनिया की हद से बाहर रहता हूँ
घर मेरा छोटा है लेकिन जाती है

दुनिया भर के शहरों का कल्चर यक्साँ
आबादी, तनहाई बनती जाती है

मैं शीशे के घर में पत्थर की मछली
दरिया की खुश्बू, मुझमें क्यों आती है

पत्थर बदला, पानी बदला, बदला क्या
इन्साँ तो जज़्बाती था, जज़्बाती है

काग़ज़ की कश्ती, जुग्नू झिलमिल-झिलमिल
शोहरत क्या है, इक नदिया बरसाती है
बशीर बद्र ( मुसाफ़िर ) 1998

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कुछ चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र

हम भी दरया हैं हमें अपना हुनर  मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कही मील का पत्थर नहीं देखा

कही यूँ भी आ मिरी आँखमें कि मिरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

गर्म कपड़ों का सन्दूक़ मत खोलना, वर्ना यादों की काफूर जैसी महक
खून में आग बन कर उतर जायेगी, सुब्ह तक ये मकाँ ख़ाक हो जायेगा

ख़ुदा की इतनी बड़ी काइनात में मैंने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला

घड़ी दो घड़ी हम को पलकों पे रख
यहाँ अाते आते ज़माने लगे

ख़ुदा एेसे एहसास का नाम है
रहे सामने ओर दिखाई न दे

लेहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ

अपने आंगन की उदासी से ज़रा बात करो
नीम के सूखे हुए पेड़ को सन्दल कर दो

सन्नाटे की शाख़ों पर कुछ ज़ख़्मी परिन्दे हैं
ख़ामोशी बज़ाते खुद आवाज़ का सेहरा है

नाहा गया था मैं कल जुग्नुओं की बारिश में
वो मेरे कांधे पे सर रख के खूब रोई थी

चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से ज़मीं
ग़ज़ल के शेर कहाँ रोज़ रोज़ होते हैं

वक़्त के होंट हमें छू लेंगे
अनकहे बोल हैं गा लो हमको

–  बशीर बद्र

Dr. Bashir Badr

चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए ।

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उसके लिए तो मैंने यहा तक दुआयें की
मेरी तरह से कोई उसे चाहता भी हो ।

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आखो में रहा, दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफिर ने समन्दर नहीं देखा ।

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कभी बरसात में शादाब बेलें सूख जाती है
हरे पेड़ो के गिरने का कोई मौसम नहीं होता ।

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कभी सात रंगो का फूल हूँ कभी धूप हूँ कभी धूल हूँ
मैं तमाम कपड़े बदल चुका तिरे मौसमों की बरात में ।

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इरादे हौसले, कुछ ख्वाब कुछ भूली हुई यादें
गज़ल के एक धागे में कई मोती पिरोए है ।

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बारिश बारिश कच्ची क़ब्र का घुलना है
जां लेवा एहसास अकेले रहने का ।

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पलकें भी चमक उठती है सोते में हमारी
आँखो को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते ।
—-बशीर बद्र