वान गॉग के अंतिम आत्मचित्र से बातचीत : अनीता वर्मा

एक पुराने परिचित चेहरे परन टूटने की पुरानी चाह थीआँखें बेधक तनी हुई नाकछिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कानदूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी कोव्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इंतज़ार करता था मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआउसे थोड़ा-सा क्या किया नहीं जा सकता था कालाआँखें…

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