ग़ज़ल – इन्दु श्रीवास्तव

  आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ रुदादे-सफ़र पूछ मगर रास्ता न पूछ गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले सहरा कहाँ था और कहाँ ज़लज़ला न पूछ वाँ से चले हैं जबसे मुसलसल नशे में है ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ वाक़िफ़ नहीं है इश्क़…

Amen- कुछ और नज़्में

Amen Give everything away— Ideas, breath, vision, thoughts. Peel off words from the lips, and sounds from the tongue. Wipe off the lines from the palms. Give up your ego, for you are not yourself. Take off the body beautiful from your soul. Finish your prayers, say Amen! And surrender the soul. – Gulzar (…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… आस्मान बुझता ही नहीं, और दरिया रौशन रहता है इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का जैसे रात में ‘प्लेन’ से रौशन शहर दिखाई देते हैं! पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के…

सूर्य ग्रहन

मेरे भीतर से उठ रहा है ख़लाओं का काला चाँद ढक रहा है मेरे सूरज को धीरे धीरे रंगों भरा जीवन बदल रहा है सेपिया तसवीर और फिर धीरे धीरे ब्लेक एंड व्हाइट सोचती हूँ बन जाऊं एक स्फ़टिक का प्रिज़्म कहीं से ढूँढ लाउँ एक उजली सफेद किरण जो रंगों से भर दे मेरे…

मख़मली ढलानों पर – दीप्ति नवल

मख़मली ढलानों पर मख़मली ढलानो पर आख़िरी आवाज़ थम चुकी है चरवाहे की दिन है कि दबे पांव गुज़र रहा है करीब से सफेद चोटियों पे रंग बिखेर रही है शफक नर्म हवाओं से गूंजती वादीमें कहीं कच्चे रास्ते है, कहीं पानी की जैसे गलियां सी और खेल रही है गलियों में डूबते हुए सूरज…

अहसास – आशमा कौल

आसमान जब मुझे अपनी बाँहों में लेता है और ज़मीन अपनी पनाहों में लेती है मैं उन दोनों के मिलन की कहानी लिख जाती हूँ, श्वास से क्षितिज बन जाती हूँ । दिशाएँ जब भी मुझे सुनती हैं हवाएँ जब भी मुझे छूती हैं मैं ध्वनि बन फैल जाती हूँ और छुअन से अहसास हो…

एक शाम – अनुपमा चौहान

बिखरे हुये लम्हों की लडी बना ली है जब चाहे गले मे डाल ली जब चाहे उतार दी झील का सारा पानी उतर आया आँखों में न जाने कितनी गागर खाली हैं तैरता था उसमें तिनका कोई जो यूँ ही आँखों छलक गया कभी हौले से उतरूँ सैलाब की रवानियों में कि मेरी गागर अभी…

सच इतना भर ही है – अर्चना कुमारी

तलाश जारी है इन दिनों कविताओं में यथार्थ की जीवन के लक्ष्य की मानवता के उपसंहार की सबकी भिन्न रचनाओं में सत्य भी अलग-अलग है यथार्थ देखने सुनने भर अनुभूति शून्य है सब अपना घर,अपने बच्चे अपने लोग,अपना मोहल्ला अपना शहर,अपना राज्यसभा क्रमशः सबसे अन्त में आता है अपना देश विदेश की खबरों में उस…

उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता

उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता हमेशा हो सितारा हम-सफ़र आसाँ नहीं होता जो आँखों ओट है चेहरा उसी को देख कर जीना ये सोचा था कि आसाँ है मगर आसाँ नहीं होता बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैं सहर की राह तकना ता-सहर आसाँ नहीं होता अँधेरी कासनी रातें यहीं से हो…

दो कविताएँ – वेणु गोपाल

आ गया था ऐसा वक्त कि भूमिगत होना पड़ा अंधेरे को नहीं मिली कोई सुरक्षित जगह उजाले से ज्यादा। छिप गया वह उजाले में कुछ यूं कि शक तक नहीं हो सकता किसी को कि अंधेरा छिपा है उजाले में। जबकि फिलहाल चारों ओर उजाला ही उजाला है! ………………………… अंधेरी रात में सड़कों पर दूधिया…