ग़ज़ल – साहिर देहल्वी ( સરળ ગુજરાતી સમજૂતી સાથે )

दरमियान-ए-जिस्म-ओ-जाँ है इक अजब सूरत की आड़ मुझ को दिल की दिल को है मेरी अनानियत की आड़ आ गया तर्क-ए-ख़ुदी का गर कभी भूले से ध्यान दिल ने पैदा की हर एक जानिब से हर सूरत की आड़ देते हैं दिल के एवज़ वो दर्द बहर-ए-इम्तिहाँ लेते हैं नाम-ए-ख़ुदा अपनी तमानिय्यत की आड़ नफ़्स-परवर…

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रौशन जमाल-ए-यार से है- हसरत मोहानी

This particular Ghazal starts with the description of a beautiful beloved and in the last two Sher, there is mention of ongoing struggle for freedom; that is what I found very interesting. This Ghazal is beautifully written. …………………………………. रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम               जमाल-ए-यार = beauty of the beloved…

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ज़िन्दगी से उन्स है – साहिर लुधियानवी

ज़िन्दगी से उन्स है     उन्स- प्रेम हुस्न से लगाव है धड़कनों में आज भी इश्क़ का अलाव है दिल अभी बुझा नहीं रंग भर रहा हूँ मैं ख़ाका ए-हयात में         ख़ाका ए-हयात- जीवन चित्र आज भी हूँ मुन्हमिक       मुन्हमिक- व्यस्त फ़िक्रे-कायनात में          फ़िक्रे-कायनात-…

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पलकों से भागे सपनों-से नीमपके फल, लम्हे !

ब्लोग जगत के मेरे मित्रों, पाँचवी सालगिरह का ज़श्न मनाते हुए आज मेरी आप लोगों के द्वारा सबसे ज़्यादा पढी गई हिन्दी कविताएँ पेश कर रही हूँ। यह बताते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है कि हिन्दीमें लिखना ये ब्लोग के साथ ही शुरु हुआ है, उस माइनेमें आप मेरे हिन्दी लेखिनी की सर्जनात्मक…

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जश़्ने सुख़नगोई, ब्लोग के पाँचवे जन्मदिन पर…

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो ( मेयारी – qualitative) राहत इंदौरी …….. तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा तिरे सामने आसमाँ और भी हैं   (शाहीं= eagle) अल्लामा इक़बाल  ब्लोग जगत के मेरे मित्रों, अपने ब्लोग के पाँच साल पूरे होने की खुशी…

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गज़ल – क़तील शिफ़ाई

अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते करते याद तुझ को अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ आख़री हिचकी…

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मिलना न मिलना एक बहाना है और बस – सलीम कौसर

मिलना न मिलना एक बहाना है और बस तुम सच हो बाक़ी जो है फ़साना है और बस लोगों को रास्ते की ज़रूरत है और मुझे इक संग-ए-रहगुज़र को हटाना है और बस                   संग-ए-रहगुज़र = stone on the way मसरूफ़ियत ज़ियादा नहीं है मिरी यहाँ मिट्टी…

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कुछ चुने हुए शेर : ​सलीम कौसर

बिछड़ती और मिलती साअतों के दरमियान इक पल यही इक पल बचाने के लिए सब कुछ गँवाया है                       साअतों = times : : : साँस लेने से भी भरता नहीं सीने का ख़ला जाने क्या शय है जो बे-दख़्ल हुई है मुझ में  …

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अभिव्यक्ति का प्रश्न – दुष्यंत कुमार ( સરળ ગુજરાતી સાર સાથે )

अभिव्यक्ति का प्रश्न प्रश्न अभिव्यक्ति का है, मित्र! किसी मर्मस्पर्शी शब्द से या क्रिया से, मेरे भावों, अभावों को भेदो प्रेरणा दो! यह जो नीला ज़हरीला घुँआ भीतर उठ रहा है, यह जो जैसे मेरी आत्मा का गला घुट रहा है, यह जो सद्य-जात शिशु सा कुछ छटपटा रहा है, यह क्या है? क्या है…

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काश ऐसा होता – लीना टिब्बी

काश ऐसा होता कि ईश्वर मेरे बिस्तर के पास रखे पानी भरे गिलास के अन्दर से बैंगनी प्रकाश पुंज-सा अचानक प्रकट हो जाता… काश ऐसा होता कि ईश्वर शाम की अजान बन कर हमारे ललाट से दिन भर की थकान पोंछ देता… काश ऐसा होता कि ईश्वर आसूँ की एक बूंद बन जाता जिसके लुढ़कने…

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हलकी नीली यादें – Memories Of Light Blue

हलकी नीली यादें ओ विस्मृति के पहाड़ों में निर्वासित मेरे लोगो ! ओ मेरे रत्नों और जवाहरातो ! क्यों ख़ामोशी के कीचड़ में सोए हुए हो तुम ? ओ मेरे आवाम ! गुम हो चुकी हैं तुम्हारी यादें तुम्हारी हलकी नीली, वो आसमानी यादें । हमारे दिमागों में गाद भर चुकी है और विस्मरण के…

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सितारे – Stars:​ Giuseppe Ungaretti

हमारे ऊपर एक बार फिर जलती हैं कपोल-कथाएँ हवा के पहले झोंके में ही झर जाएँगी पत्तियों के साथ किन्तु अगली साँस के साथ वापस लौट आएगी एक नई झिलमिलाहट – उंगारेत्ती (8 फ़रवरी 1888- 2 जून 1970) अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल ……………….. Stars They come back high to burn the tales. They…

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Every Song – हर गीत

Every Song Every song is the remains of love. Every light the remains of time. A knot of time. And every sigh the remains of a cry. Federico García Lorca Translated by A. S. Kline © Copyright 2007 All Rights Reserved ……………….. हर गीत चुप्पी है प्रेम की हर तारा चुप्पी है समय की समय…

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चिराग़ जलते हैं – सूर्यभानु गुप्त

जिनके अंदर चिराग़ जलते हैं, घर से बाहर वही निकलते हैं। बर्फ़ गिरती है जिन इलाकों में, धूप के कारोबार चलते हैं। दिन पहाड़ों की तरह कटते हैं, तब कहीं रास्ते पिघलते हैं। ऐसी काई है अब मकानों पर, धूप के पाँव भी फिसलते हैं। खुदरसी उम्र भर भटकती है, लोग इतने पते बदलते हैं।…

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कुछ चुने हुए शेर:​ सूर्यभानु गुप्त

जिनके नामों पे आज रस्ते हैं वे ही रस्तों की धूल थे पहले …… अन्नदाता हैं अब गुलाबों के जितने सूखे बबूल थे पहले …… मूरतें कुछ निकाल ही लाया पत्थरों तक अगर गया कोई ……. यहाँ रद्दी में बिक जाते हैं शाइर गगन ने छोड़ दी ऊँचाइयाँ हैं कथा हर ज़िंदगी की द्रोपदी-सी बड़ी…

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हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ – सूर्यभानु गुप्त

हैज़ा, टी. बी.,चेचक से मरती थी पहले दुनिया मन्दिर, मसजिद, नेता, कुरसी हैं ये रोग अभी के ….. इक मोम के चोले में धागे का सफ़र दुनिया, अपने ही गले लग कर रोने की सज़ा पानी। …….. हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ मैं भी…

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The Song Of The Barren Orange Tree – Poem by Federico García Lorca

Woodcutter. Cut out my shadow. Free me from the torture of seeing myself fruitless. Why was I born among mirrors? The daylight revolves around me. And the night herself repeats me in all her constellations. I want to live not seeing self. I shall dream the husks and insects change inside my dreaming into my…

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नए गीत – फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

नए गीत तीसरा पहर कहता है- मैं छाया के लिए प्यासा हूँ चांद कहता है- मुझे तारों की प्यास है बिल्लौर की तरह साफ़ झरना होंठ मांगता है और हवा चाहती है आहें मैं प्यासा हूँ ख़ुशबू और हँसी का मैं प्यासा हूँ चन्द्रमाओं, कुमुदनियों और झुर्रीदार मुहब्बतों से मुक्त गीतों का कल का एक…

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नई आवाज – रामधारी सिंह “दिनकर”

कभी की जा चुकीं नीचे यहाँ की वेदनाएँ, नए स्वर के लिए तू क्या गगन को छानता है ? [1] बताएँ भेद क्या तारे ? उन्हें कुछ ज्ञात भी हो, कहे क्या चाँद ? उसके पास कोई बात भी हो। निशानी तो घटा पर है, मगर, किसके चरण की ? यहाँ पर भी नहीं यह…

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नज़्म – अमीक़ हनफ़ी (સરળ ગુજરાતી ભાવાનુવાદ સાથે)

ज़ात का आईना-ख़ाना जिस में रौशन इक चराग़-ए-आरज़ू चार-सू ज़ाफ़रानी रौशनी के दाएरे मुख़्तलिफ़ हैं आईनों के ज़ाविए एक लेकिन अक्स-ए-ज़ात; इक इकाई पर उसी की ज़र्ब से कसरत-ए-वहदत का पैदा है तिलिस्म ख़ल्वत-ए-आईना-ख़ाना में कहीं कोई नहीं सिर्फ़ मैं! मैं ही बुत और मैं ही बुत-परस्त! मैं ही बज़्म-ए-ज़ात में रौनक़-अफ़रोज़ जल्वा-हा-ए-ज़ात को देता…

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