श्रोता : मनीषा जोषी

श्रोता कविता-पाठ करते वक़्तमेरे गले मेंअचानक से प्यास उठती है। डूब जाती है आवाज़जैसे गिर पड़ी होनदी के ऊपर से उड़ रहे किसी पक्षी केमुँह में पकड़े हुए शिकार-सी। मैं पेश करती हूँ कुछ कविताएँसिवाय उसके! मेरी वह एक प्रिय कविताजो मर रही होती है उस नदी में। कविता श्रवण के लिए बैठे हुए चेहरेजब…

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गांधीजी के जन्मदिन पर : दुष्यन्त कुमार

गांधीजी के जन्मदिन पर मैं फिर जनम लूंगाफिर मैंइसी जगह आउंगाउचटती निगाहों की भीड़ मेंअभावों के बीचलोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगालँगड़ाकर चलते हुए पावों कोकंधा दूँगागिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता कोबाँहों में उठाऊँगा । इस समूह मेंइन अनगिनत अचीन्ही आवाज़ों मेंकैसा दर्द हैकोई नहीं सुनता !पर इन आवाजों कोऔर इन कराहों कोदुनिया सुने मैं ये…

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साबुत आईने : धर्मवीर भारती

साबुत आईने इस डगर पर मोह सारे तोड़ले चुका कितने अपरिचित मोड़ पर मुझे लगता रहा हर बारकर रहा हूँ आइनों को पार दर्पणों में चल रहा हूँ मैंचौखटों को छल रहा हूँ मैं सामने लेकिन मिली हर बारफिर वही दर्पण मढ़ी दीवार फिर वही झूठे झरोखे द्वारवही मंगल चिन्ह वन्दनवार किन्तु अंकित भीत पर,…

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नज़्म : गुलज़ार

मैं जितनी भी ज़बानें बोल सकता हूँ वो सारी आज़माई हैं… ‘ख़ुदा’ ने एक भी समझी नहीं अब तक, न वो गर्दन हिलाता है, न वो हंकारा ही देता है! कुछ ऐसा सोच कर— शायद फ़रिश्तों ही से पढ़वा ले, कभी मैं चाँद की तख़्ती पे लिख देता हूँ, कोई शेर ‘ग़ालिब’ का तो धो…

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गीत मेरे : हरिवंशराय बच्चन

 गीत मेरे गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन। एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ,वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ,छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन,गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन। प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुँ,और अपने कंठ पर तुझको सँवारूँ,कह उठे संसार, आया ज्‍योति का क्षण,गीत मेरे, देहरी का…

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दिन ढले की बारिश : धर्मवीर भारती

बारिश दिन ढले कीहरियाली-भीगी, बेबस, गुमसुमतुम हो और,और वही बलखाई मुद्राकोमल शंखवाले गले कीवही झुकी-मुँदी पलक सीपी में खाता हुआ पछाड़बेज़बान समन्दर अन्दरएक टूटा जलयानथकी लहरों से पूछता है पतादूर- पीछे छूटे प्रवालद्वीप का बांधूंगा नहींसिर्फ़ काँपती उंगलियों से छू लूँ तुम्हेंजाने कौन लहरें ले आई हैंजाने कौन लहरें वापिस बहा ले जाएंगी मेरी इस…

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सृजन का शब्द

आरम्भ में केवल शब्द थाकिन्तु उसकी सार्थकता थी श्रुति बनने मेंकि वह किसी से कहा जाय मौन को टूटना अनिवार्य थाशब्द का कहा जाना थाताकि प्रलय का अराजक तिमिर व्यवस्थित उजियाले में रूपान्तरित हो ताकि रेगिस्तानगुलाबों की क्यारी बन जाय शब्द का कहा जाना अनिवार्य था।आदम की पसलियों के घाव से इवा के मुक्त अस्तित्व की प्रतिष्ठा के लिएशब्द को…

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गज़ल – निदा फ़ाज़ली

सफ़र को जब भी किसी दास्तान में रखना क़दम यक़ीन में मंज़िल गुमान में रखना  जो साथ है वही घर का नसीब है लेकिन जो खो गया है उसे भी मकान में रखना  जो देखती हैं निगाहें वही नहीं सब कुछ ये एहतियात भी अपने बयान में रखा  वो एक ख़्वाब जो चेहरा कभी नहीं बनता बना के चाँद…

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बेजगह – अनामिका

“अपनी जगह से गिर कर कहीं के नहीं रहते केश, औरतें और नाख़ून” – अन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे हमारे संस्कृत टीचर। और मारे डर के जम जाती थीं हम लड़कियाँ अपनी जगह पर।   जगह? जगह क्या होती है? यह वैसे जान लिया था हमने अपनी पहली कक्षा में ही।   याद था हमें एक-एक क्षण आरंभिक पाठों का– राम, पाठशाला जा ! राधा, खाना पका ! राम,…

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झाडुवाली – ओमप्रकाश वाल्मीकि

सुबह पाँच बजे हाथ में थामे झाड़ू घर से निकल पड़ती है रामेसरी लोहे की हाथ गाड़ी धकेलते हुए खड़ाँग-खड़ाँग की कर्कश आवाज़ टकराती है शहर की उनींदी दीवारों से गुज़रती है सुनसान पड़े चौराहों से करती हुई ऐलान जागो! पूरब दिशा में लाल-लाल सूर्य उगने वाला है नगरपालिका की सुनसान सड़कें धुँधलकों की जमात…

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दोहा, पद – संत रैदास (1398-1518 )

रैदास हमारौ राम जी, दशरथ करि सुत नाहिं। राम हमउ मांहि रहयो, बिसब कुटंबह माहिं॥ रैदास कहते हैं कि मेरे आराध्य राम दशरथ के पुत्र राम नहीं हैं। जो राम पूरे विश्व में, प्रत्येक घर−घर में समाया हुआ है, वही मेरे भीतर रमा हुआ है। * ऊँचे कुल के कारणै, ब्राह्मन कोय न होय। जउ जानहि ब्रह्म आत्मा, रैदास कहि ब्राह्मन सोय॥ मात्र ऊँचे कुल में जन्म लेने के कारण ही कोई ब्राह्मण नहीं कहला सकता। जो ब्रहात्मा को जानता है, रैदास कहते हैं कि वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है। * रैदास इक ही बूंद सो, सब ही भयो वित्थार। मुरखि हैं तो करत हैं, बरन अवरन विचार॥ रैदास कहते हैं कि यह सृष्टि एक ही बूँद का विस्तार है अर्थात् एक ही ईश्वर से सभी प्राणियों का विकास हुआ है; फिर भी जो लोग जात-कुजात का विचार अर्थात् जातिगत भेद−विचार करते हैं, वे नितांत मूर्ख हैं। * ब्राह्मण…

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कुछ चुने हुए शेर, ग़ज़ल – राहत इंदौरी

मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए * ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो मेयारी = qualitative * आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के *…

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कुछ अशआर, नज़्म – निदा फ़ाज़ली

यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है  मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है  चलता जाता है कारवान-ए-हयात  इब्तिदा क्या है इंतिहा क्या है  ख़ुद से मिलने का चलन आम नहीं है वर्ना  अपने…

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अनबींधे मन का गीत ( સરળ ગુજરાતી સાર સાથે)

जल तो बहुत गहरा थाकमलों तक समझे हम झील वह अछूती थीपुरइन से ढंकी हुईसूरज से अनबोलीचाँद से न खुली हुईकई जन्म अमर हुएकोरी अब सिर्फ देहपहली ही बिजलीहमें नौका-सी बाँध गई लहरें किन्तु भीतर थींरोओं तक समझे हम तट से बंधा मनछाया कृतियों में मग्न रहास्वप्न की हवाओं मेंतिरती हुयी गन्ध रहाअतल बीचसीपी का…

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उनको प्रणाम : नागार्जुन

उनको प्रणाम जो नहीं हो सके पूर्ण–काम मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।  कुछ कंठित औ’ कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट जिनके अभिमंत्रित तीर हुए; रण की समाप्ति के पहले ही जो वीर रिक्त तूणीर हुए ! उनको प्रणाम !  जो छोटी–सी नैया लेकर उतरे करने को उदधि–पार; मन की मन में ही रही¸ स्वयं हो गए उसी में निराकार ! उनको प्रणाम !  जो उच्च शिखर…

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सह अस्तित्व – नेहल

हजारों कन्सट्रकशन वर्क के रजकणसेघूंटा हुआ हवा का दम छूटा और ली राहत की साँसबेवजह इधर-उधर दौडते रहते पहियों केधुंए से चोक हुए गले को पवनने किया साफ़आह, आसमान आज लगे नहाया, साफ़, नीलाधूप चमक रही उजलीतृणांकुर अपना कोमल शीश उठाए देख रहे अजूबावातावरण में गूंजती पक्षियों की ऑर्केस्ट्रा परडोल रहे है पेड़प्रकृति मना रही…

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मेरा सफ़र. – अली सरदार जाफ़री

हमचू सब्ज़ा बारहा रोईदा-ईम (हम हरियाली की तरह बार-बार उगे हैं) रूमी … फिर इक दिन ऐसा आएगा आँखों के दिये बुझ जाएँगे हाथों के कँवल कुम्हलाएँगे और बर्गे-ज़बाँ से नुत्क़ो-सदा की हर तितली उड़ जाएगी इक काले समन्दर की तह में कलियों की तरह से खिलती हुई फूलों की तरह से हँसती हुई सारी…

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कितना अच्छा होता है – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

कुछ चुनी हुई पंक्तिआँ कुछ देर और बैठो अभी तो रोशनी की सिलवटें हैं हमारे बीच। उन्हें हट तो जाने दो – शब्दों के इन जलते कोयलों पर गिरने तो दो समिधा की तरह मेरी एकांत समर्पित खामोशी! ….. सारा अस्तित्व रेल की पटरी-सा बिछा है हर क्षण धड़धड़ाता हुआ निकल जाता है। ….. जलहीन,सूखी,पथरीली,…

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तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गयी हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गयी है जो खचाखच भरा है, कहीं भी एकान्त नहीं न बाहर, न भीतर। हर चीज़ का आकार घट गया है, पेड़ इतने छोटे हो गये हैं कि मैं…

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अश्मीभूत हो रहे भस्मासूर हम – नेहल

बहते हुए काल की गर्तामें अश्मीभूत हो रहे हम! कुछ सदिओं की धरोहर परंपराओं से आज को मूल्यांकित करने में मशरुफ़ सदिओं के अंघेरे कर रहे हैं अट्टहास्य हमारे महान, श्रेष्ठ होने के दावों पर। इस अकळ, गहन ब्रह्मांड के एक बिंदु मात्र जिसको सूर्य बनाने की जिदमें अहोनिश जलते-बुझते हम। बहेती, लुप्त हो रही…

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અશ્મીભૂત થતા ભસ્માસૂર આપણે – નેહલ

સરકતી જતી કાળની ગર્તામાં અશ્મીભૂત થતા આપણે થોડીક સદીઓની જણસને વળગી આજને મૂલવવાની રમતમાં ગળાડૂબ સદીઓ પારના અંધારા ખડખડ હસે છે આપણા મહાનતા, શ્રેષ્ઠતાના દાવાઑ પર. આ ગહન બ્રહ્માંડ નું એક ટપકું માત્ર એને ઘૂંટી ઘૂંટીને સૂર્ય બનાવવાની મથામણમાં ભડ ભડ બળતા, બૂઝતા આપણે. વહેતી, લુપ્ત થતી નદીઓ હતા, ન હતા થતા નગાધિરાજો તૂટતા-જોડાતા ભૂમિ…

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फ़हमीदा रियाज़ – ग़ज़ल

क्यूँ नूर-ए-अबद दिल में गुज़र कर नहीं पाता                 नूर-ए-अबद  = eternal light सीने की सियाही से नया हर्फ़ लिखा है                       हर्फ़  = word .. .. .. .. ये पैरहन जो मिरी रूह का उतर न सका…

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घास तो मुझ जैसी है – The Grass is really like me

THE GRASS IS REALLY LIKE ME The grass is also like me it has to unfurl underfoot to fulfill itself but what does its wetness manifest: a scorching sense of shame or the heat of emotion? The grass is also like me As soon as it can raise its head the lawnmower obsessed with flattening…

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ग़ज़ल – साहिर देहल्वी ( સરળ ગુજરાતી સમજૂતી સાથે )

दरमियान-ए-जिस्म-ओ-जाँ है इक अजब सूरत की आड़ मुझ को दिल की दिल को है मेरी अनानियत की आड़ आ गया तर्क-ए-ख़ुदी का गर कभी भूले से ध्यान दिल ने पैदा की हर एक जानिब से हर सूरत की आड़ देते हैं दिल के एवज़ वो दर्द बहर-ए-इम्तिहाँ लेते हैं नाम-ए-ख़ुदा अपनी तमानिय्यत की आड़ नफ़्स-परवर…

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रौशन जमाल-ए-यार से है- हसरत मोहानी

This particular Ghazal starts with the description of a beautiful beloved and in the last two Sher, there is mention of ongoing struggle for freedom; that is what I found very interesting. This Ghazal is beautifully written. …………………………………. रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम               जमाल-ए-यार = beauty of the beloved…

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ज़िन्दगी से उन्स है – साहिर लुधियानवी

ज़िन्दगी से उन्स है     उन्स- प्रेम हुस्न से लगाव है धड़कनों में आज भी इश्क़ का अलाव है दिल अभी बुझा नहीं रंग भर रहा हूँ मैं ख़ाका ए-हयात में         ख़ाका ए-हयात- जीवन चित्र आज भी हूँ मुन्हमिक       मुन्हमिक- व्यस्त फ़िक्रे-कायनात में          फ़िक्रे-कायनात-…

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पलकों से भागे सपनों-से नीमपके फल, लम्हे !

ब्लोग जगत के मेरे मित्रों, पाँचवी सालगिरह का ज़श्न मनाते हुए आज मेरी आप लोगों के द्वारा सबसे ज़्यादा पढी गई हिन्दी कविताएँ पेश कर रही हूँ। यह बताते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है कि हिन्दीमें लिखना ये ब्लोग के साथ ही शुरु हुआ है, उस माइनेमें आप मेरे हिन्दी लेखिनी की सर्जनात्मक…

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जश़्ने सुख़नगोई, ब्लोग के पाँचवे जन्मदिन पर…

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो ( मेयारी – qualitative) राहत इंदौरी …….. तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा तिरे सामने आसमाँ और भी हैं   (शाहीं= eagle) अल्लामा इक़बाल  ब्लोग जगत के मेरे मित्रों, अपने ब्लोग के पाँच साल पूरे होने की खुशी…

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गज़ल – क़तील शिफ़ाई

अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते करते याद तुझ को अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ आख़री हिचकी…

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मिलना न मिलना एक बहाना है और बस – सलीम कौसर

मिलना न मिलना एक बहाना है और बस तुम सच हो बाक़ी जो है फ़साना है और बस लोगों को रास्ते की ज़रूरत है और मुझे इक संग-ए-रहगुज़र को हटाना है और बस                   संग-ए-रहगुज़र = stone on the way मसरूफ़ियत ज़ियादा नहीं है मिरी यहाँ मिट्टी…

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कुछ चुने हुए शेर : ​सलीम कौसर

बिछड़ती और मिलती साअतों के दरमियान इक पल यही इक पल बचाने के लिए सब कुछ गँवाया है                       साअतों = times : : : साँस लेने से भी भरता नहीं सीने का ख़ला जाने क्या शय है जो बे-दख़्ल हुई है मुझ में  …

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अभिव्यक्ति का प्रश्न – दुष्यंत कुमार ( સરળ ગુજરાતી સાર સાથે )

अभिव्यक्ति का प्रश्न प्रश्न अभिव्यक्ति का है, मित्र! किसी मर्मस्पर्शी शब्द से या क्रिया से, मेरे भावों, अभावों को भेदो प्रेरणा दो! यह जो नीला ज़हरीला घुँआ भीतर उठ रहा है, यह जो जैसे मेरी आत्मा का गला घुट रहा है, यह जो सद्य-जात शिशु सा कुछ छटपटा रहा है, यह क्या है? क्या है…

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काश ऐसा होता – लीना टिब्बी

काश ऐसा होता कि ईश्वर मेरे बिस्तर के पास रखे पानी भरे गिलास के अन्दर से बैंगनी प्रकाश पुंज-सा अचानक प्रकट हो जाता… काश ऐसा होता कि ईश्वर शाम की अजान बन कर हमारे ललाट से दिन भर की थकान पोंछ देता… काश ऐसा होता कि ईश्वर आसूँ की एक बूंद बन जाता जिसके लुढ़कने…

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हलकी नीली यादें – Memories Of Light Blue

हलकी नीली यादें ओ विस्मृति के पहाड़ों में निर्वासित मेरे लोगो ! ओ मेरे रत्नों और जवाहरातो ! क्यों ख़ामोशी के कीचड़ में सोए हुए हो तुम ? ओ मेरे आवाम ! गुम हो चुकी हैं तुम्हारी यादें तुम्हारी हलकी नीली, वो आसमानी यादें । हमारे दिमागों में गाद भर चुकी है और विस्मरण के…

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सितारे – Stars:​ Giuseppe Ungaretti

हमारे ऊपर एक बार फिर जलती हैं कपोल-कथाएँ हवा के पहले झोंके में ही झर जाएँगी पत्तियों के साथ किन्तु अगली साँस के साथ वापस लौट आएगी एक नई झिलमिलाहट – उंगारेत्ती (8 फ़रवरी 1888- 2 जून 1970) अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल ……………….. Stars They come back high to burn the tales. They…

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Every Song – हर गीत

Every Song Every song is the remains of love. Every light the remains of time. A knot of time. And every sigh the remains of a cry. Federico García Lorca Translated by A. S. Kline © Copyright 2007 All Rights Reserved ……………….. हर गीत चुप्पी है प्रेम की हर तारा चुप्पी है समय की समय…

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चिराग़ जलते हैं – सूर्यभानु गुप्त

जिनके अंदर चिराग़ जलते हैं, घर से बाहर वही निकलते हैं। बर्फ़ गिरती है जिन इलाकों में, धूप के कारोबार चलते हैं। दिन पहाड़ों की तरह कटते हैं, तब कहीं रास्ते पिघलते हैं। ऐसी काई है अब मकानों पर, धूप के पाँव भी फिसलते हैं। खुदरसी उम्र भर भटकती है, लोग इतने पते बदलते हैं।…

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कुछ चुने हुए शेर:​ सूर्यभानु गुप्त

जिनके नामों पे आज रस्ते हैं वे ही रस्तों की धूल थे पहले …… अन्नदाता हैं अब गुलाबों के जितने सूखे बबूल थे पहले …… मूरतें कुछ निकाल ही लाया पत्थरों तक अगर गया कोई ……. यहाँ रद्दी में बिक जाते हैं शाइर गगन ने छोड़ दी ऊँचाइयाँ हैं कथा हर ज़िंदगी की द्रोपदी-सी बड़ी…

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हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ – सूर्यभानु गुप्त

हैज़ा, टी. बी.,चेचक से मरती थी पहले दुनिया मन्दिर, मसजिद, नेता, कुरसी हैं ये रोग अभी के ….. इक मोम के चोले में धागे का सफ़र दुनिया, अपने ही गले लग कर रोने की सज़ा पानी। …….. हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ मैं भी…

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The Song Of The Barren Orange Tree – Poem by Federico García Lorca

Woodcutter. Cut out my shadow. Free me from the torture of seeing myself fruitless. Why was I born among mirrors? The daylight revolves around me. And the night herself repeats me in all her constellations. I want to live not seeing self. I shall dream the husks and insects change inside my dreaming into my…

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नए गीत – फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

नए गीत तीसरा पहर कहता है- मैं छाया के लिए प्यासा हूँ चांद कहता है- मुझे तारों की प्यास है बिल्लौर की तरह साफ़ झरना होंठ मांगता है और हवा चाहती है आहें मैं प्यासा हूँ ख़ुशबू और हँसी का मैं प्यासा हूँ चन्द्रमाओं, कुमुदनियों और झुर्रीदार मुहब्बतों से मुक्त गीतों का कल का एक…

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नई आवाज – रामधारी सिंह “दिनकर”

कभी की जा चुकीं नीचे यहाँ की वेदनाएँ, नए स्वर के लिए तू क्या गगन को छानता है ? [1] बताएँ भेद क्या तारे ? उन्हें कुछ ज्ञात भी हो, कहे क्या चाँद ? उसके पास कोई बात भी हो। निशानी तो घटा पर है, मगर, किसके चरण की ? यहाँ पर भी नहीं यह…

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नज़्म – अमीक़ हनफ़ी (સરળ ગુજરાતી ભાવાનુવાદ સાથે)

ज़ात का आईना-ख़ाना जिस में रौशन इक चराग़-ए-आरज़ू चार-सू ज़ाफ़रानी रौशनी के दाएरे मुख़्तलिफ़ हैं आईनों के ज़ाविए एक लेकिन अक्स-ए-ज़ात; इक इकाई पर उसी की ज़र्ब से कसरत-ए-वहदत का पैदा है तिलिस्म ख़ल्वत-ए-आईना-ख़ाना में कहीं कोई नहीं सिर्फ़ मैं! मैं ही बुत और मैं ही बुत-परस्त! मैं ही बज़्म-ए-ज़ात में रौनक़-अफ़रोज़ जल्वा-हा-ए-ज़ात को देता…

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पंचभूतों ने जो मुझे सिखलाया – के० सच्चिदानंदन

धरती ने मुझे सिखलाया है- सब कुछ स्वीकारना सब कुछ के बाद सबसे परे हो जाना हर ऋतु में बदलना यह जानते हुए कि स्थिरता मृत्यु है चलते चले जाना है अन्दर और बाहर। अग्नि ने मुझे सिखलाया है- तृष्णा में जलना नाचते-नाचते हो जाना राख दुख से होना तपस्वी काली चट्टानों के दिल और…

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कुआँ…नारी जीवन की अभिव्यक्ति / मधु गजाधर

कुआँ मैं एक कुआँ हूँ, गहरा कुआँ , मेरे अन्दर के अँधेरे में भी शांति है , शीतलता है ,… क्योंकि मैं जल से ओत प्रोत हूँ, जल… प्रेम का जल , अपनत्व का जल, ममता का जल, संस्कार का जल, श्रधा के समर्पण का जल, जल ही जल , चहुँ और मेरे जल ही…

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Those Bells Are Driving Me Crazy- चढ़न चरी कई

Those Bells Are Driving Me Crazy Those bells are driving me crazy How can I sleep? Ten times a day I pine for him I’ll wear the chains of his love Till death Standing at the edge They cry out, ‘My love!’ But they love only their lives Some claim, ‘I’m all yours’ But wet…

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Poems – Dunya Mikhail

Dunya Mikhail was born in Iraq (Baghdad) in 1965 and came to the United States thirty years later. She’s renowned for her subversive, innovative, and satirical poetry. After graduation from the University of Baghdad, she worked as a journalist and translator for the Baghdad Observer. Facing censorship and interrogation, she left Iraq, first to Jordan…

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न्यूयार्क में एक तितली – A Butterfly in New York – Sinan Antoon

बग़दाद के अपने बग़ीचे में मैं अक्सर भागा करता था उसके पीछे मगर वह उड़कर दूर चली जाती थी हमेश। आज तीन दशकों बाद एक दूसरे महाद्वीप में वह आकर बैठ गई मेरे कन्धे पर। नीली समन्दर के ख़यालों या आख़िरी साँसें लेती किसी परी के आँसुओं की तर॥ उसके पर स्वर्ग से गिरती दो…

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मेरा एकांत -सुरेश जोशी

मेरा एकांत मैं देता हूं तुम्हें एकांत— हंसी के जमघट के बीच एक अकेला अश्रु शब्दों के शोर के बीच एक बिंदु भर मौन यदि तुम्हें सहेजकर रखना है तो यह रहा मेरा एकांत— विरह सम विशाल अंधेरे सम नीरंध्र तुम्हारी उपेक्षा जितना गहरा जिसका साक्ष्य न सूर्य, न चंद्रमा ऐसा केवल एकांतातीत एकांत नहीं,…

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नज़्म – साहिर लुधियानवी

अश्कों में जो पाया है, वो गीतों में दिया है इस पर भी सुना है, कि ज़माने को गिला है जो तार से निकली है, वो धुन सबने सुनी है जो साज़ पे गुज़री है, वो किस दिल को पता है …… ज़िन्दगी से उन्स है हुस्न से लगाव है धड़कनों में आज भी इश़्क…

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ख़्वाब – नेहल

जब पलकों से कोई ख़्वाब गिरता है तो नींद भी मचल जाती है उसके पीछे दौड़ जाती है आँखों को खूला छोड कर। ख़्वाबों का पीछा करना कहाँ आसान है न जागते न सोते फिर भी न जाने क्यूँ ख़्वाबो से नींद का सौदा करने की आदत सी हो गई है। ख़्वाब; क्या है…. अरमानों…

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ग़ज़ल – कुमार पाशी

अपने गिर्द-ओ-पेश का भी कुछ पता रख दिल की दुनिया तो मगर सब से जुदा रख लिख बयाज़-ए-मर्ग में हर जा अनल-हक़ और किताब-ए-ज़ीस्त में बाब-ए-ख़ुदा रख उस की रंगत और निखरेगी ख़िज़ाँ में ये ग़मों की शाख़ है इस को हरा रख आ ही जाएगी उदासी बाल खोले आज अपने दिल का दरवाज़ा खुला…

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आज फिर शुरू हुआ जीवन – આજ ફરીથી – रघुवीर सहाय

आज फिर शुरू हुआ जीवन आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया आज एक छोटी-सी बच्ची आई,किलक मेरे कन्धे चढ़ी आज मैंने आदि से अन्त तक पूरा गान किया आज फिर जीवन शुरू हुआ । – रघुवीर सहाय…

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कुमार पाशी – चुनिंदा अशआर

हवा के रंग में दुनिया पे आश्कार हुआ मैं क़ैद-ए-जिस्म से निकला तो बे-कनार हुआ आश्कार = clear, manifest, visible, व्यक्त, प्रकट, ज़ाहिर, स्पष्ट, साफ़ बे-कनार = boundless, without a shore, infinite **** पढ़ के हक़ाएक़ कहीं न अंधा हो जाऊँ मुझ को अब हो सके तो कुछ अफ़्साने दो हक़ाएक़ = facts, realities ****…

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ग़ज़ल – शहरयार

बताऊँ किस तरह अहबाब को आँखें जो ऐसी हैं कि कल पलकों से टूटी नींद की किर्चें समेटी हैं सफ़र मैंने समंदर का किया काग़ज़ की कश्ती में तमाशाई निगाहें इसलिए बेज़ार इतनी हैं ख़ुदा मेरे अता कर मुझको गोयाई कि कह पाऊँ ज़मीं पर रात-दिन जो बातें होती मैंने देखी हैं तू अपने फ़ैसले…

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ग़ज़ल – दुष्यंत कुमार

कुछ चुनिंदा अशआर : सिर्फ़ शाइ’र देखता है क़हक़हों की असलियत हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं …     …    …   …   … लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो ..   ..   ..   ..    ..…

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वक़्त – जावेद अख़्तर

ये वक़्त क्या है? ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था, तब कहाँ था कहीं तो होगा गुज़र गया है तो अब कहाँ है कहीं तो होगा कहाँ से आया किधर गया है ये कब से कब तक का सिलसिला है ये वक़्त क्या है ये वाक़ये…

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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक – मिर्ज़ा ग़ालिब

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक (A prayer needs a lifetime, an answer to obtain who can live until the time that you decide to deign) दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक (snares are spread in every…

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बशीर बद्र (रोशनी के घरौंदे)

  शाम आँखों में, आँख पानी में और पानी सराए-फ़ानी में झिलमिलाते हैं कश्तियों में दीए पुल खड़े सो रहे हैं पानी में ख़ाक हो जायेगी ज़मीन इक दिन आसमानों की आसमानी में वो हवा है उसे कहाँ ढूँढूँ आग में, ख़ाक में, कि पानी में आ पहाड़ों की तरह सामने आ इन दिनों मैं…

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Deep in the Stillness-  सन्नाटे में दूर तक

Deep in the Stillness He threw me away like a clod of earth. He didn’t know I was a thing with a soul. He didn’t know I was alive. He kept on throwing me like a clod of earth out of his way – onto that neglected path that happened to be mine. And so…

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चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (3)

धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे गुर्बतों का दौर है जाड़ों की शिददत है बहुत …… उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मीं रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत ……. तारों भरी पलकों की बरसायी हुई ग़ज़लें है कौन पिरोये जो बिखरायी हुई ग़ज़लें ……… पास से…

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सफ़र – नेहल

हरे दरख़्तो के चम्पई अंधेरोमें शाम के साये जब उतरते है रात की कहानी छेड देते है जुग्नूओं की महफ़िलमें। रात की रानी खुश्बू की सौगात से भर देती है यादों के मंज़र। तन्हाई कब तन्हा रह पाती है!? चाँद, सितारे, सपने मेरे साथी उगते, डूबते मेरे संग आकाश हो या हो मन का आँगन…

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इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का – जिगर मुरादाबादी

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है दिल संग-ए-मलामत का हर-चंद निशाना है दिल फिर भी मिरा दिल है दिल ही तो ज़माना है हम इश्क़ के मारों का…

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अब मैं लौट रही हूँ / अमृता भारती

अब कोई फूल नहीं रहा न वे फूल ही जो अपने अर्थों को अलग रख कर भी एक डोरी में गुँथ जाते थे छोटे-से क्षण की लम्बी डोरी में । अब मौसम बदल गया है और टहनियों की नम्रता कभी की झर गई है — मैं अनुभव करती हूँ बिजली का संचरण बादलों में दरारें…

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कालान्तर – Then And Now

कैशोर्य के उन दिनों में मैं सुबह की ख़ुशियों से भर जाता था, पर शामों में रुदन ही रुदन था ; अब, जबकि मैं बूढ़ा हूँ हर दिन उगता है शंकाओं से आच्छन्न, तो भी इसकी सन्ध्याएँ पावन हैं, शान्त और प्रसन्न । कालान्तर / फ़्रेडरिक होल्डरलिन अमृता भारती द्वारा अनूदित …………………… Then And Now…

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Sunshine – Gulzar

Sunshine A golden sun shines on floating islands in the cosmos. The rarefied mist has slipped aside. Your face quivers in my palms. The morning cupped in my hands. A soft refulgence courses through my whole being. I have drunk in the drops of light, which had slipped from your radiant soul and suffused your…

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A Moment in Time – एक लम्हा

Life is the name given to a few moments, and In but one of those fleeting moments Two eyes meet eloquently Looking up from a cup of tea, and Enter the heart piercingly And say, Today do not speak I’ll be silent too Let’s just sit thus. Holding each other’s hand United by this gift…

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मिली हवाओं में उड़ने की – वसीम बरेलवी

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो कहाँ था बस में मेरे उस को रोकना यारो मेरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो तमाम शहर ही जिस की…

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ग़ज़ल – इन्दु श्रीवास्तव

    आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ रुदादे-सफ़र पूछ मगर रास्ता न पूछ गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले सहरा कहाँ था और कहाँ ज़लज़ला न पूछ वाँ से चले हैं जबसे मुसलसल नशे में है ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ वाक़िफ़ नहीं है…

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Amen- कुछ और नज़्में

Amen Give everything away— Ideas, breath, vision, thoughts. Peel off words from the lips, and sounds from the tongue. Wipe off the lines from the palms. Give up your ego, for you are not yourself. Take off the body beautiful from your soul. Finish your prayers, say Amen! And surrender the soul. – Gulzar (…

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रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है…

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है… आस्मान बुझता ही नहीं, और दरिया रौशन रहता है इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का जैसे रात में ‘प्लेन’ से रौशन शहर दिखाई देते हैं! पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के…

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सूर्य ग्रहन- नेहल

  मेरे भीतर से उठ रहा है ख़लाओं का काला चाँद ढक रहा है मेरे सूरज को धीरे धीरे रंगों भरा जीवन बदल रहा है सेपिया तसवीर और फिर धीरे धीरे ब्लेक एंड व्हाइट सोचती हूँ बन जाऊं एक स्फ़टिक का प्रिज़्म कहीं से ढूँढ लाउँ एक उजली सफेद किरण जो रंगों से भर दे…

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मख़मली ढलानों पर – दीप्ति नवल

मख़मली ढलानों पर मख़मली ढलानो पर आख़िरी आवाज़ थम चुकी है चरवाहे की दिन है कि दबे पांव गुज़र रहा है करीब से सफेद चोटियों पे रंग बिखेर रही है शफक नर्म हवाओं से गूंजती वादीमें कहीं कच्चे रास्ते है, कहीं पानी की जैसे गलियां सी और खेल रही है गलियों में डूबते हुए सूरज…

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अहसास – आशमा कौल

  आसमान जब मुझे अपनी बाँहों में लेता है और ज़मीन अपनी पनाहों में लेती है मैं उन दोनों के मिलन की कहानी लिख जाती हूँ, श्वास से क्षितिज बन जाती हूँ । दिशाएँ जब भी मुझे सुनती हैं हवाएँ जब भी मुझे छूती हैं मैं ध्वनि बन फैल जाती हूँ और छुअन से अहसास…

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एक शाम – अनुपमा चौहान

बिखरे हुये लम्हों की लडी बना ली है जब चाहे गले मे डाल ली जब चाहे उतार दी झील का सारा पानी उतर आया आँखों में न जाने कितनी गागर खाली हैं तैरता था उसमें तिनका कोई जो यूँ ही आँखों छलक गया कभी हौले से उतरूँ सैलाब की रवानियों में कि मेरी गागर अभी…

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सच इतना भर ही है – अर्चना कुमारी

तलाश जारी है इन दिनों कविताओं में यथार्थ की जीवन के लक्ष्य की मानवता के उपसंहार की सबकी भिन्न रचनाओं में सत्य भी अलग-अलग है यथार्थ देखने सुनने भर अनुभूति शून्य है सब अपना घर,अपने बच्चे अपने लोग,अपना मोहल्ला अपना शहर,अपना राज्यसभा क्रमशः सबसे अन्त में आता है अपना देश विदेश की खबरों में उस…

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उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता

उजाला दे चराग़-ए-रहगुज़र आसाँ नहीं होता हमेशा हो सितारा हम-सफ़र आसाँ नहीं होता जो आँखों ओट है चेहरा उसी को देख कर जीना ये सोचा था कि आसाँ है मगर आसाँ नहीं होता बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैं सहर की राह तकना ता-सहर आसाँ नहीं होता अँधेरी कासनी रातें यहीं से हो…

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दो कविताएँ – वेणु गोपाल

आ गया था ऐसा वक्त कि भूमिगत होना पड़ा अंधेरे को नहीं मिली कोई सुरक्षित जगह उजाले से ज्यादा। छिप गया वह उजाले में कुछ यूं कि शक तक नहीं हो सकता किसी को कि अंधेरा छिपा है उजाले में। जबकि फिलहाल चारों ओर उजाला ही उजाला है! ………………………… अंधेरी रात में सड़कों पर दूधिया…

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जब साज़ की लय बदल गई थी

जब साज़ की लय बदल गई थी वो रक़्स की कौन सी घड़ी थी रक़्स- dance अब याद नहीं कि ज़िंदगी में मैं आख़िरी बार कब हँसी थी जब कुछ भी न था यहाँ पे मा-क़ब्ल दुनिया किस चीज़ से बनी थी मा-क़ब्ल- before preceding, former मुट्ठी में तो रंग थे हज़ारों बस हाथ से…

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ग़ज़ल – मुसव्विर सब्ज़वारी

कोई ख़्वाब सर से परे रहा ये सफ़र सराब-ए-सफ़र रहा मैं शनाख़्त अपनी गँवा चुका गई सूरतों की तलाश में सराब-ए-सफ़र – mirage of journey, शनाख़्त – recognition, identification, knowledge इक कुतुब-ख़ाना हूँ अपने दरमियाँ खोले हुए सब किताबें सफ़्हा-ए-हर्फ़-ए-ज़ियाँ खोले हुए कुतुब-ख़ाना – library, सफ़्हा-ए-हर्फ़-ए-ज़ियाँ – page of wordloss अपने होने का कुछ एहसास…

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देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ – निदा फ़ाज़ली

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ साहिल की गिली रेत पर बच्चों के खेल-सा हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ फ़ुर्सत ने आज…

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सर्जना के क्षण – अज्ञेय

एक क्षण भर और रहने दो मुझे अभिभूत फिर जहाँ मैने संजो कर और भी सब रखी हैं ज्योति शिखायें वहीं तुम भी चली जाना शांत तेजोरूप! एक क्षण भर और लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते! बूँद स्वाती की भले हो बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से वज्र…

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काँच के पीछे चाँद भी था – गुलज़ार

काँच के पीछे चाँद भी था काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी तीनों थे हम, वो भी थे, और मैं भी था, तनहाई भी यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं सोंधी-सोंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी दो-दो शक्लें दिखती हैं इस बहके-से आईने में…

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एक आशीर्वाद – दुष्यंत कुमार

जा तेरे स्वप्न बड़े हों। भावना की गोद से उतर कर जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें। चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये रूठना मचलना सीखें। हँसें मुस्कुराएँ गाएँ। हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें उँगली जलाएँ। अपने पाँव पर खड़े हों। जा तेरे स्वप्न बड़े हों। – दुष्यंत कुमार source: kavitakosh.org

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लम्हे- नेहल

लम्हे दिन की गठरी खोल समेट रही हूँ होले होले गिरते लम्हे बूँदों-से छलककर  टपकते लम्हे पत्तों-से गिरते, उठते लम्हे फूलों-से खिलते, मुरझाते लम्हे हवाओं-से बहते, हाथमें न आते लम्हे रेत-से फिसलते, सरकते लम्हे पलकों से भागे सपनों-से नीमपके फल,  लम्हे ! कभी सहरा सी धूप में ओढ़े हुए बादल लम्हे तो कभी सर्दियों में…

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ग़ज़ल – दाग़ देहलवी

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता दाग़ देहलवी काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है मुझ को ख़बर नहीं मिरी मिट्टी कहाँ की है सुन के मिरा फ़साना उन्हें लुत्फ़ आ गया सुनता हूँ अब कि रोज़ तलब क़िस्सा-ख़्वाँ की है पैग़ाम-बर की बात पर आपस में रंज क्या मेरी…

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दिल के काबे में नमाज़ पढ़ – नीरज

दिल के काबे में नमाज़ पढ़ दिल के काबे में नमाज़ पढ़, यहां-वहां भरमाना छोड़। सांस-सांस तेरी अज़ान है, सुबह शाम चिल्लाना छोड़। उसका रुप न मस्जिद में है उसकी ज्योति न मंदिर में जिस मोती को ढूंढ़ रहा तू, वो है दिल के समुन्दर में। मन की माला फेर, हाथ की यह तस्वीह घुमाना…

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अच्छा लगता है- नेहल

कभी यूँ ही अकेले बैठना अच्छा लगता है। चुपचाप से; अपने-आप से भी खामोश रहना, अच्छा लगता है। मन की गुफाओ में बहते झरनों की धून सुनना, गुनगुनाना अच्छा लगता है। कभी दिल के दरवाज़ों को बंद रखना दस्तकों से बेपरवा होना अच्छा लगता है। दिल के बाग की खूशबूओं में खोना, महकना अच्छा लगता…

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अमीर खुसरो – Amir Khusrau(1253-1325)

આ અદ્ભુત રચના પસંદ કરવાનો હેતુ એમાં થયેલો સૂફી પરંપરા, ભક્તિ માર્ગ અને અદ્વૈતનો સુભગ સંગમ છે. પરમ તત્ત્વ અહીં રંગરેજ છે, પ્રિયતમ છે, સંત નિઝામ્મુદ્દીન નું રુપ લઈને પ્રસ્તુત છે. અહીં આત્માની ચૂંદડીને પરમ તત્ત્વના રંગે રંગવાની વાત છે. આત્માને અહીં પ્રિયતમા તરીકે નિરૂપીને પ્રેમમાર્ગની ટોચનો અનુભવ કરાવવામાં આવ્યો છે. એ પરમ તત્ત્વને મળવા,…

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औरत

औरत उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे उठ मेरी जान! मेरे साथ…

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कबीर बानी-Poems of Kabir

मुरली बजत अखंड सदा से, तहाँ प्रेम झनकारा है। प्रेम-हद तजी जब भाई, सत लोक की हद पुनि आई। उठत सुगंध महा अधिकाई, जाको वार न पारा है। कोटि भान राग को रूपा, बीन सत-धुन बजै अनूपा ।। यह मुरली सदा से निरंतर बज रही है, और प्रेम इसकी ध्वनी है। जब मनुष्य प्रेम की…

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मुसाफ़िर – बशीर बद्र

सदियों की गठरी सर पर ले जाती है दुनिया बच्ची बन कर वापस आती है मैं दुनिया की हद से बाहर रहता हूँ घर मेरा छोटा है लेकिन जाती है दुनिया भर के शहरों का कल्चर यक्साँ आबादी, तनहाई बनती जाती है मैं शीशे के घर में पत्थर की मछली दरिया की खुश्बू, मुझमें क्यों…

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ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं तिलिस्म-ए-गुंबद-ए-गर्दूं को तोड़ सकते हैं ज़ुजाज की ये इमारत है संग-ए-ख़ारा नहीं ख़ुदी में डूबते हैं फिर उभर भी आते हैं मगर ये हौसला-ए-मर्द-ए-हेच-कारा नहीं तिरे मक़ाम को अंजुम-शनास क्या जाने कि ख़ाक-ए-ज़िदा है तू ताबा-ए-सितारा नहीं यहीं…

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दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है

दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है नोक-ए-ख़ंजर ही बताएगी कि ख़ूँ कितना है आँधियाँ आईं तो सब लोगों को मालूम हुआ परचम-ए-ख़्वाब ज़माने में निगूँ कितना है जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा वो ये क्या जानें बिखरने में सकूँ कितना है वो जो प्यासे थे समुंदर से भी प्यासे लौटे…

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​नज़्म – नेहल

​नज़्म ( zen poem ) पीली पत्तीओं के रास्तो से हो कर पहुंचे हैं; उन मौसमो के मकाम पर, जहां अब तक एक डाल हरी भरी सी है! फूलों और काँटों से परे, तितलीओं और भवरों से अलग, मौसम के बदलते मिज़ाज ठहर गए है वहां! ढूँढते नहीं वे अब बहारो के निशान। डरते नहीं…

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नज़्म – गुलज़ार

ख़लाओं में तैरते जज़ीरों पे चम्पई धूप देख कैसे बरस रही है महीन कोहरा सिमट रहा है हथेलियों में अभी तलक तेरे नर्म चेहरे का लम्स एेसे छलक रहा है कि जैसे सुबह को ओक में भर लिया हो मैंने बस एक मध्दम-सी रोशनी मेरे हाथों-पैरों में बह रही है तेरे लबों पर ज़बान रखकर…

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ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई

ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई ये ज़मीं जिस कदर सजाई गई जिंदगी की तड़प बढ़ाई गई आईने से बिगड़ के बैठ गए जिनकी सूरत उन्हें दिखाई गई दुश्मनों से ही बैर निभ जाए दोस्तों से तो आश्नाई गई नस्ल-दर-नस्ल इंतज़ार रहा क़स्र टूटे न बेनवाई गई ज़िंदगी का नसीब क्या कहिए एक सीता थी…

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ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा -गुलज़ार

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा रात भर तारे बातें करते हैं रात काटे कोई किधर तन्हा अपने साये से चौंक जाते हैं उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा डूबने वाले पार जा उतरे नक़्शे-पा अपने छोड़ कर तन्हा दिन गुज़रता नहीं है लोगों में रात…

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इक सबसे छोटी लव-स्टोरी! – नेहल

  अब तक सब कुछ याद है! सफेद कुर्ते पर नीला पश्मीना ओढे तुमने जब खिडकी से बरामदे में झाँका  था तुम्हारी नज़र से बतीयाने में मेरी गोटेवाली जूती सरक गई! हवा में अपनी उडान रोक परांदे थम से गए, तो चोटियाँ गुस्से से आके लिपट गई । फूलकारी दुपट्टा संभालने में कंगना और झुमके में…

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बूंदे – नेहल

  बूंदे धूँधले शीशों पर सरकती बूंदे। बारिष के रुकने पर पेडोंके पत्तो से बरसती बूंदे। कभी सोने सी; कभी हीरे सी चमकती बूंदे। परिंदे की गरदन पर थिरकती बूंदे। अपनी कोख में समाये हुए कइ इन्द्रधनु, फलक को रंग देती बूंदे! प्यासे की हलक से उतरते, दरिया बन जाती बूंदे! आँखों में छूप के बैठे तो;…

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हम्द – निदा फ़ाज़ली

I simply love this poem for its simplicity of words and high philosophy behind this! Very few writers can achieve this! . . . . . . हम्द नील गगन पर बैठे कब तक चाँद सितारों से झाँकोगे। पर्वत की ऊँची चोटी से कब तक दुनिया को देखोगे। आदर्शो के बन्द ग्रन्थों में कब तक…

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निदा फ़ाज़ली – चुनिंदा अशआर

ज़िन्दगी की सच्चाइयों को खूबसूरती से पेश करनेवाले निदा फ़ाज़ली मेरी नज़र में उजालों के , उम्मीदों के शायर है और हमारे दिलो में हमेशा ज़िन्दा रहेंगे धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो .. .. .. .. .. .. कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं…

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हम पत्ते तूफ़ान के – नीरज

वेद न कुरान बांचे, ली न ज्ञान की दीक्षा सीखी नहीं भाषा कोई, दी नहीं परीक्षा, दर्द रहा शिक्षक अपना, दुनिया पाठशाला दुःखो की किताब, जिसमें आंसू वर्णमाला। लिखना तुम कहानी मेरी, दिल की कलम से ठाठ है फ़क़ीरी अपना, जनम जनम से। ‘कारवां गुज़र गया’ के कवि डॉ गोपालदास नीरज को ‘हिन्दी काव्य की…

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तुम्हारे इन्तिज़ार में – नेहल

​चुप सी बरसातसे भीगी  रातों में  जब  पत्ते भी अपनी सरसराहट से चौंकते है विंडचाइम अपने मन की धुन बजाता है दिया भी  नाचती परछाइयों में तुम्हारा नाम लिखता रहता है  गुजरती हवा खिड़की से झांक के पूछ बैठती है ‘अब तक जगे हो?’ तुम्हारे इन्तिज़ार में कोई मुझे अकेला नहीं छोड़ता! – नेहल 

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अहमद फ़राज़ – ख़्वाब मरते नहीं

ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसे कि जो रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएँगे जिस्म की मौत से ये भी मर जाएँगे ख़्वाब मरते नहीं ख़्वाब तो रौशनी हैं नवा हैं हवा हैं जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं ज़ुल्म के दोज़ख़ों से भी फुँकते नहीं रौशनी और नवा…

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अहमद फ़राज़ – चुनिंदा अशआर

चुनिंदा अशआर शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है मेरे अन्दर बारिश होती रहती है। …. मैं चुप रहा तो सारा जहाँ था मेरी तरफ हक बात की तो कोई कहाँ था मेरी तरफ। …. मैंने सितमगरों को पुकारा है खुद ‘फराज़’ वरना किसी का ध्यान कहाँ था मेरी तरफ। …. कितना आसाँ था तेरे हिज्र…

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Neglected Poems – Gulzar

A Poem Perched On a Moment A poem perched on a moment Imprisoned in a butterfly net Then its wings cut off To keep it pinned in an album: If this is not injustice, what is? Entangled in the paper the moments are mummified Only the colours of the poem remain on my fingertips! _…

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ग़ज़ल – Ghazal – कैफ़ी आज़मी

ग़ज़ल मैं ढूँढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता नयी ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नयी ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाये नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वह तेग़ मिल गयी जिससे हुआ है क़त्ल मेरा किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता वह मेरा गाँव है वो मेरे गाँव…

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कौन तुम मेरे हृदय में

कौन तुम मेरे हृदय में? कौन मेरी कसक में नित मधुरता भरता अलक्षित? कौन प्यासे लोचनों में घुमड़ घिर झरता अपरिचित? स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा नींद के सूने निलय में! कौन तुम मेरे हृदय में? अनुसरण निश्वास मेरे कर रहे किसका निरन्तर? चूमने पदचिन्ह किसके लौटते यह श्वास फिर फिर कौन बन्दी कर मुझे अब बँध…

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धुआँ- गुलज़ार

आँखों में जल रहा है ये बुझता नहीं धुआँ उठता तो है घटा सा, बरसता नहीं धुआँ पलकों के ढापने से भी रूकता नहीं धुआँ कितनी उँडेलीं आँखें ये बुझता नहीं धुआँ आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं महमां ये गर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ चूल्हे नहीं जलाये कि बस्ती ही जल…

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मैं अनंत पथ में लिखती जो

मै अनंत पथ में लिखती जो सस्मित सपनों की बाते उनको कभी न धो पायेंगी अपने आँसू से रातें! उड़् उड़ कर जो धूल करेगी मेघों का नभ में अभिषेक अमिट रहेगी उसके अंचल- में मेरी पीड़ा की रेख! तारों में प्रतिबिम्बित हो मुस्कायेंगी अनंत आँखें, हो कर सीमाहीन, शून्य में मँडरायेगी अभिलाषें! वीणा होगी…

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Poems of Kabir- कबीर बानी

  कबीर बानी सन्तो, सहज समाधि भली। साँईते मिलन भयो जा दिन तें, सुरत न अन्त चली।। आँख न मूँदूँ काम न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ। खुले नैन मैं हँस हँस देखूँ, सुन्दर रूप निहारूँ।। कहूँ सो नाम सुनूँ सो सुमिरन, जो कछु करूँ सो पूजा। गिरह-उद्यान एकसम देखूँ, भाव मिटाऊँ दूजा।। जहँ जहँ…

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क्या तुम जानते हो?!

क्या तुम जानते हो पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत घर-प्रेम और जाति से अलग एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन के बारे में बता सकते हो तुम । बता सकते हो सदियों से अपना घर तलाशती एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता । क्या तुम जानते हो अपनी कल्पना में किस…

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આવીશ?

આવીશ? સવારનો સમય છે: બફારો છે અને તડકામાં એક પ્રતીતિકર ચમક પણ. વનસ્પતિનો હરિયાળો રંગ પણ ઠંડક વિનાનો લાગે છે. એક સુંદર મજાનું પીળું પંખી ત્યાં ઘાસ પર કૂદી રહ્યું છે બરાબર એ જ રીતે જેમ તું છે સુંદર નીરવ અને પ્રેમને ઘાસની જેમ ધીરે ધીરે ઓળખતી અને એનાથી પોતાને માટે અર્થ શોધતી. આ પંખીને…

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तुम्हारी याद! -नेहल

पिछली रातों में जब ठंडी हवाएँ चलती है, अकेलेपन की! तब आके लिपट जाती है, नरम गर्म कम्बलों सी तुम्हारी याद! -नेहल

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ઍશ-ટ્રે – અમૃતા પ્રીતમ ऐश ट्रे – अमृता प्रीतम

ऐश ट्रे इलहाम के धुएँ से लेकर सिगरेट की राख तक उम्र की सूरज ढले माथे की सोच बले एक फेफड़ा गले एक वीयतनाम जले… और रोशनी अँधेरे का बदन ज्यों ज्वर में तपे और ज्वर की अचेतना में – हर मज़हब बड़राये हर फ़लसफ़ा लंगड़ाये हर नज़्म तुतलाये और कहना-सा चाहे कि हर सल्तनत…

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बातें – વાતો – અમૃતા પ્રીતમ – પ્રતિનિધિ કવિતા અનુવાદ : જયા મહેતા

बातें आ साजन, आज बातें कर लें… तेरे दिल के बाग़ों में हरी चाह की पत्ती-जैसी जो बात जब भी उगी, तूने वही बात तोड़ ली हर इक नाजुक बात छुपा ली, हर एक पत्ती सूखने डाल दी मिट्टी के इस चूल्हे में से हम कोई चिनगारी ढूँढ़ लेंगे एक-दो फूँफें मार लेंगे बुझती लकड़ी…

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कुछ चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (2)

हम भी दरया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा ……….. जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कही मील का पत्थर नहीं देखा ………. कही यूँ भी आ मिरी आँखमें कि मिरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे,…

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My words my sketch -नेहल

Trying something new, something different! I hope you will like it!     गिले-शिकवे की हवाओंमें है नमी, दिलका मौसम है धुआँ धुआँ, रुह की ज़मीं भी है नम ईश्क का पौधा तो लग चूका धूप सी तेरी हँसी की तलाश है। -नेहल

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मीर तक़ी मीर

मीर तक़ी मीर  (1722-23  –   1810) उर्दू के पहले सबसे बड़े शायर जिन्हें ‘ ख़ुदा-ए-सुख़न, (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है।  कुछ  अशआर दिल से रुख़सत हुई कोई ख़्वाहिश गिर्या कुछ बे-सबब नहीं आता     गिर्या- weeping, lamentation हम ख़ुदा के कभी क़ाइल ही न थे उन को देखा तो ख़ुदा याद आया  …

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चांद और सितारे – इकबाल – The Moon and The Stars

चांद और सितारे डरते-डरते दमे-सहर से तारे कह्ने लगे क़मर से नज़ारे रहे वही फ़लक पर हम थक भी गये चमक-चमक कर काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना चलना, चलना, मुदाम चलना बेताब है इस जहां की हर शै कहते है जिसे सकूं, नहीं है होगा कभी ख़त्म यह सफ़र क्या मंज़िल कभी आयेगी नज़र क्या?…

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शहर -अमृता प्रीतम – चुनी हुई कवितायें

  मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है सड़कें – बेतुकी दलीलों-सी… और गलियाँ इस तरह जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता कोई उधर हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआ दीवारें-किचकिचाती सी और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी जो उसे देख कर यह…

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મારું સરનામું – અમૃતા પ્રીતમ, मेरा पता – अमृता प्रीतम

તારા પ્રેમનું એક ટીપું એમાં ભળી ગયું હતું તેથી મેં જિંદગીની બધી કડવાશ પી લીધી…. . . . . . . . મારું સરનામું આજે મેં મારા ઘરનો નંબર ભૂંસી નાખ્યો અને ગલીને માથે લાગેલું ગલીનું નામ હઠાવી નાંખ્યું છે અને પ્રત્યેક રસ્તાની દિશાનું નામ ભૂંસી નાંખ્યું છે પરંતુ તમારે જો ખરેખર મને પામવી હોય…

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घरौंदे -नेहल

जो छोड़ आये है पीछे ; वोह गलियाँ वोह मकान वोह दीवारें वोह दरीचे अपनी शक़्ल भूल चुके हैं ! गुजरी हवाओं के थपेड़ोंमे अपने अहसास के पत्ते खो चुके है! आज मेरा माज़ी अपनी सफर से भटक गया है जानी पहचानी राहों के बदले रंगरूपमें कहीं बह गया है! आंसुओं की ओस से क्या…

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कुछ ख़याल कुछ लब़्ज़ – नेहल

    दर्दकी सुराही, भर के आँसुओ से जीओ मॅय ज़िंदगीका समज़ के उसे पीओ। भरके आँखोमें रोज़ सपनोकी रोशनी दिवाली अपनी अमावसोकी करके जीओ । .   .   .   .   .   .   .   .   .   . बुइने लगी है आग ज़िंदगीकी,मेरे दोस्त फूंकदो एक-दो नज़्म शायद लौ…

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी

मुलाक़ात यह रात उस दर्द का शजर है जो मुझसे तुझसे अज़ीमतर है अज़ीमतर है कि उसकी शाख़ों में लाख मशअल-बकफ़ सितारों के कारवां, घिर के खो गए हैं हज़ार महताब उसके साए में अपना सब नूर, रो गए हैं यह रात उस दर्द का शजर है जो मुझसे तुझसे अज़ीमतर है मगर इसी रात…

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आईने – नेहल

उतार लिए जब से सारे आईने अपने अंदर , सूरत अपनी कहीं नज़र आती नहीं | -नेहल

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इश्क – नेहल

थक चुके इस प्यास की सिलवटें गिनते गिनते आओ इन सिलवटों के समंदर में डूब जाते हैं… शायद ये इश्क नाव बनकर उभर आए । -नेहल

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रात पश्मीने की – गुलज़ार

    ऐसे आई है तेरी याद अचानक जैसे पगडंडी कोई पेड़ों से निकले इक घने माज़ी के जंगल में मिली हो । । : – : – : – : – : – : – : – : जिस्म के खोल के अन्दर ढूंढ़ रहा हूँ और कोई एक जो मैं हूँ , एक…

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वसंत के ख्वाब – नेहल

आज बादल जम कर बरसे, ज़मींको अपनी नमीं से भर दिया। अपने सारे ख्वाब ज़मींकी छातिमें उडेल दिये। अब धरती बुन रही है हरे हरे मौज़ॆ, ख्वाब जो पनप रहे है उसके अंदर!! वसंत ले कर आएगा बधाई, अब तो बस ईन्द्रधनु बाँट रहा है रंग-रंगी मिठाईयाँ!! -नेहल

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चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र (1)

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए । – – – – – – – – – – उसके लिए तो मैंने यहा तक दुआयें की मेरी तरह से कोई उसे चाहता भी हो । – – – – – — – आखो में…

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रात – नेहल

रातके माथे पर जो बल पडे है, चाँदके सफ़रका बयाँ है। उजालोंके सूरज तो निकले है कबसे, ये कौनसा चिलमन दर्मियाँ है। – – – – – – —- – – – आओ एक आरजूकी तिली जलाओ, कि रात आज काफी जगी हुई है। कहेदो हवाओ से चूपचाप गुजरे, कि निंदकी चिठ्ठी कहीं उड ग्ई…

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ज़िंदगी – मोहम्मद इक़बाल

बरतर अज़ अंदेशा-ए-सूदो-ज़ियां है ज़िंदगी है कभी जां और कभी तस्लीमे-जां है ज़िंदगी । तू इसे पैमाना-ए-इमरोज़ो-फ़रदा से न नाप जावदां, पैहम रवां, हर दम जवां है ज़िंदगी । अपनी दुनिया आप पैदा कर अगर ज़िंदों में है सिर्रे-आदम है ज़मीरे-कुल फ़का है ज़िंदगी । ज़िंदगानी की हक़ीक़त कोहकन के दिल से पूछ जूए-शीरो-तेशा-व-संगे-गरा है…

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सुकून – नेहल

कल रात जब मैने बिना नींद के पथराइ आँखोसे देखा । आधा अधूरासा चाँद खिला था मैले धूंधले आसमाँ के माथे पर । पेड चुपचाप से खडे थे एक पत्ता भी हिलाये बिना सुन रहे थे; एक-दूजे की गोद मे लेटे मकानो की फुसफुसाहट! एक हवाकी लहर जो गूजरा करती थी हमारे दरमियाँ आज न…

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Poems by KABIR [1440-1518]

  My friends, today I want to share works of my favorite poet Kabir. The unique thing about this post is the original Hindi verses are explained by renowned writer Ali Sardar Jafrisahab and English translation is by Shri Rabindranath Tagore, indeed best of both “words”!   मन, तू पार उतर कहाँ जैहौ । आगे…

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एक अलग अंदाज़…. – नेहल

  एक अर्से के बाद अपनी तन्हाई से रुबरु हो गये, ना उसने कुछ पूछा ,  ना हम बयां  करने रुके ! ज़ींदगीकी की किताब आखरी पन्ने तक पलटते गये, जो जिया हमने, वोह गहराइ में लब्ज़  कहां उतर पाये ! तेर्री परस्तीमें ही खूश होके जिते गये , तेरे मिलने के वादों पे एतबार…

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