चुनिंदा अशआर : ज़ेहरा निगाह

मय-ए-हयात में शामिल है तल्ख़ी-ए-दौराँ 
जभी तो पी के तरसते हैं बे-ख़ुदी के लिए 

मय-ए-हयात = wine of existence, तल्ख़ी-ए-दौराँ = hard times 

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औरत के ख़ुदा दो हैं हक़ीक़ीमजाज़ी 
पर उस के लिए कोई भी अच्छा नहीं होता

हक़ीक़ी = real, actual   मजाज़ी = metaphorical, allusive

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टूटे-फूटे लफ़्ज़ों के कुछ रंग घुले थे
उन की मेहंदी आज तलक भी रचाए हुए हूँ

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देर तक रौशनी रही कल रात
मैं ने ओढ़ी थी चाँदनी कल रात

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जुगनुओं के से लम्हे उड़ते थे
मेरी मुट्ठी में आ गई कल रात

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बे-चरागी से तेरी मिरे शहर-ए-दिल
वादी-ए-शेर में कुछ उजाला सा था

शहर-ए-दिल = city of heart, वादी-ए-शेर = valley, meadow of poetry

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अब ज़ौक़-ए-तलब वज्ह-ए-जुनूँ ठहर गया है
और अर्ज़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है देखो

ज़ौक़-ए-तलब = pleasure in act of seeking, वज्ह-ए-जुनूँ = cause of madness
अर्ज़-ए-वफ़ा = expression of constancy  बाइस-ए-रुस्वाई = cause of disgrace  

~ ज़ेहरा निगाह

source, meanings : rekhta.org