मधुशाला : हरिवंशराय ‘ बच्चन ‘

मधुशाला : कुछ उद्धरण

मधुर भावनाओं की सुमधुर
 नित्या बनाता हूँ हाला 
भरता हूँ इस मधु से अपने 
अंतर का प्यासा प्याला; 
उठा कल्पना के हाथों से
 स्वयं उसे पी जाता हूँ; 
अपने ही में हूँ मैं साक़ी, 
पीनेवाला, मधुशाला | 5
प्रति रसाल तरु साक़ी-सा है, 
प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर
मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल
कूक रही डाली-डाली
हर मधुऋतु में अमराई में
जग उठती है मधुशाला | 34
क्षीण, क्षुद्र क्षणभंगुर दुर्बल
मानव मिट्टी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अन्दर
कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साक़ी
अपने शत-शत कर फैला |
काल प्रबल है पीनेवाला;
संसृति है यह मधुशाला | 73
उस प्याले से प्यार मुझे जो
दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो
दूर अधर-मुख से हाला;
प्यार नहीं पा जाने में है,
पाने के अरमानों में !
पा जाता तब, हाय, न इतनी
प्यारी लगती मधुशाला | 99
एक समय संतुष्ट बहुत था
पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साक़ी,
छोटा-सा मेरा प्याला;
छोटे-से इस जग की मेरे
स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो
मेरी नन्हीं मधुशाला ! 108
छोड़ा मैंने पंथ-मतों को 
तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने
तोड़ा मैंने जब प्याला;
अब मानी मधुशाला मेरे
पीछे-पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है
मैंने जाना मधुशाला | 114
वह हाला, कर शांत सके जो
मेरे अन्तर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबित
प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं, जहाँ पर
मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती
मेरी तो वह मधुशाला | 121
अपने युग में सबको अनुपम
ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अद्भुत
ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा
एक यही उत्तर पाया—
अब न रहे वे पीनेवाले,
अब न रही वह मधुशाला ! 125

~ हरिवंशराय ‘ बच्चन ‘ (1907-2003)