शब्दों का दुःख : दुर्गा प्रसाद पंडा

शब्दों का दुःख

आदमियों की तरह
शब्दों के दुःखों की सूची भी
ख़ूब लंबी है।

शब्दों में भी होती है
बहुत कुछ अनकही वेदना
इसीलिए आजकल शब्द सारे
नज़र आते हैं
नितांत असहाय और विषण्ण।

भाव, अर्थ और संलाप के कोलाहल के बाहर रह कर
शायद वे भी जीना चाहते हैं,
निजता और एकांत जीवन।

सारा जीवन भावों का भार ढोते-ढोते
झुक कर चल रहे शब्द सारे अब निथर निःसंग
बहुत क्लांत हैं और अवसन्न-स्थिर, निःसंग

और कितने दिन शब्द भला सहते
प्रकाशन की मर्यादा
व्यंजना के क्षुर की धार
भावों की घोर यातना
अर्थ का अत्याचार?

शब्द भी बूढ़े होते हैं और मरते हैं
ठीक हमारी तरह
शब्द भी होते हैं लहूलुहान
और टूट-फूट जाते हैं काल के कर्षण में
शब्द भी चाहते हैं
इन सारे जंजालों से मुक्ति,
देखते रहते निरंतर एक ही सपना

खुल जाता भला उनकी देह से
भाव और अर्थ का यह धूसर पिंजरा
और वे उड़ जाते
मुक्त तितली की तरह
विषण्ण आकाश की फूल वाली नीरवता की तरफ़।

आदमियों की तरह
शब्दों के दुःखों की सूची भी
ख़ूब लंबी है।

~ दुर्गा प्रसाद पंडा

ओड़िया से अनुवाद :: सुजाता शिवेन

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