आग पानी : मोनिका कुमार

आग पानी

विनम्र स्त्री है वह

सभी के प्रति विनम्र

सभी से परिचित,

और सभी के लिए अजनबी।

उसकी आवाज़ धीमी थी

विनम्रता से उसकी आवाज़ धीमी हो गई

दुपट्टा ओढ़ना भले ही भूल जाए,

विनम्रता के आँचल से ढकी रहती है।

अखंड विनम्रा है वह।

विनम्रता ने सभी को उसके निकट कर दिया

विनम्रता से ही उसकी सभी से अनिवार्य दूरी भी बन गई,

दुनिया आश्वस्त हो गई थी

आग पानी से दूर

हानि से परे

विनम्रता के वायुमंडल में,

बस गई है वह।

उसे भी लगने लगा,

दुनिया अब टिक गई है

कोलाहल थम गया है

उसे पता होता विनम्रता ऐसी असरदार युक्ति है,

वह बहुत-सी परेशानियों से पहले ही बच जाती

पर पहले कैसे पता चलता,

जब तक उसने विनम्रता की वटी नहीं बनाई थी,

अपनी आग में वह जले जा रही थी

अपने पानी में डूबती जा रही थी।

विनम्रता के आवरण को जो तोड़ सके,

वटी के असर को जो बेअसर कर दे

विनम्र साँसों की आग में जो जल सके

उजले पानी में जो डूब सके,

विनम्र जीवन के हर क्षण

वह ऐसे प्रेमी की प्रतीक्षा करती है।

~ मोनिका कुमार ( Born 1977 )

स्रोत :

  • पुस्तक : आश्चर्यवत् (पृष्ठ 87)
  • रचनाकार : मोनिका कुमार
  • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
  • संस्करण : 2018

source : hindwi.org