दोहा, पद – संत रैदास (1398-1518 )

रैदास हमारौ राम जी, दशरथ करि सुत नाहिं।

राम हमउ मांहि रहयो, बिसब कुटंबह माहिं॥

रैदास कहते हैं कि मेरे आराध्य राम दशरथ के पुत्र राम नहीं हैं। जो राम पूरे विश्व में, प्रत्येक घर−घर में समाया हुआ है, वही मेरे भीतर रमा हुआ है।

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ऊँचे कुल के कारणै, ब्राह्मन कोय न होय।

जउ जानहि ब्रह्म आत्मा, रैदास कहि ब्राह्मन सोय॥

मात्र ऊँचे कुल में जन्म लेने के कारण ही कोई ब्राह्मण नहीं कहला सकता। जो ब्रहात्मा को जानता है, रैदास कहते हैं कि वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।

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रैदास इक ही बूंद सो, सब ही भयो वित्थार।

मुरखि हैं तो करत हैं, बरन अवरन विचार॥

रैदास कहते हैं कि यह सृष्टि एक ही बूँद का विस्तार है अर्थात् एक ही ईश्वर से सभी प्राणियों का विकास हुआ है; फिर भी जो लोग जात-कुजात का विचार अर्थात् जातिगत भेद−विचार करते हैं, वे नितांत मूर्ख हैं।

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ब्राह्मण खतरी बैस सूद रैदास जनम ते नांहि।

जो चाहइ सुबरन कउ पावइ करमन मांहि॥

कोई भी मनुष्य जनम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं होता। यदि कोई मनुष्य उच्च वर्ण को प्राप्त करना चाहता है तो वह केवल सुकर्म से ही उसे प्राप्त कर सकता है। सुकर्म ही मानव को ऊँचा और दुष्कर्म ही नीचा बनाता है।

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जात पांत के फेर मंहि, उरझि रहइ सब लोग।

मानुषता कूं खात हइ, रैदास जात कर रोग॥

अज्ञानवश सभी लोग जाति−पाति के चक्कर में उलझकर रह गए हैं। रैदास कहते हैं कि यदि वे इस जातिवाद के चक्कर से नहीं निकले तो एक दिन जाति का यह रोग संपूर्ण मानवता को निगल जाएगा।

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सौ बरस लौं जगत मंहि, जीवत रहि करू काम।

रैदास करम ही धरम हैं, करम करहु निहकाम॥

रैदास कहते हैं कि मनुष्य को संसार में सौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा के लिए निरंतर निष्काम कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करना ही मनुष्य−धर्म है।

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सब घट मेरा साइयाँ, जलवा रह्यौ दिखाइ।

रैदास नगर मांहि, रमि रह्यौ, नेकहु न इत्त उत्त जाइ॥

प्रत्येक शरीर में प्रभु का वास है। सभी जगह उसी का जलवा है। रैदास कहते हैं कि वह इस नगर रूपी मन में पूरी तरह रमा हुआ है। इससे बाहर वह बिल्कुल इधर−उधर नहीं जा सकता है।

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राधो क्रिस्न करीम हरि, राम रहीम खुदाय।

रैदास मोरे मन बसहिं, कहु खोजहुं बन जाय॥

रैदास कहते हैं कि राधा, कृष्ण, करीम, हरि, राम, रहीम, ख़ुदा−सभी एक ही ईश्वर के रूप मेरे मन में निवास करते हैं। फिर भला इन्हें बाहर वन में क्यों खोजूँ!

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पद

पीआ राम रसु पीआ रे॥टेक॥

भरि भरि देवै सुरति कलाली, दरिआ दरिआ पीना रे।

पीवतु पीवतु आपा जग भूला, हरि रस मांहि बौराना रे॥

दर परि बिसरि गयौ रैदास, जनमनि सद मतवारी रे।

पलु पलु प्रेम पियाला चालै, छूटे नांहि खुमारी रे॥

  • संत रैदास (१३९८-१५१८ )

सुरति = योग-साधना की एक अवस्था।, कलाली= साक़ी

बौराना= उन्मुक्त होना।

પદનો સરળ ગુજરાતી સાર: પ્રભુ પ્રેમ અને ભક્તિની ઉન્મત્ત અવસ્થા દર્શાવતું આ પદ છે. રામ-રસ, પ્રભુ ભક્તિનો પ્યાલો પીધા પછી ભક્તને દુનિયાદારી અને જગતનું ભાન નથી રહેતું. જ્યારે ખુદ પરમાત્મા જ આત્માને પ્રેમ રસના પ્યાલા ભરી ભરીને આપતા હોય ત્યારે એની ખુમારી ક્યારેય ઉતરતી નથી.

स्रोत:पुस्तक : रैदास ग्रंथावली, रचनाकार : डॉ. जगदीश शरण

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