कुछ चुने हुए शेर, ग़ज़ल – राहत इंदौरी

मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना

तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए

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ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे

नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो

मेयारी = qualitative

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आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने

चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के

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अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ

ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ

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मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था

हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए

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आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत

हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं

अज़्मत = glory, greatness

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ज़ेहन में जब भी तिरे ख़त की इबारत चमकी

एक ख़ुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से

इबारत = composition

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चमकते लफ़्ज़ सितारों से छीन लाए हैं

हम आसमाँ से ग़ज़ल की ज़मीन लाए हैं

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पावँ पत्थर कर के छोड़ेगी अगर रुक जाइए

चलते रहिए तो ज़मीं भी हम-सफ़र हो जाएगी

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उजाले बाँटने वालों पे क्या गुज़रती है

किसी चराग़ की मानिंद जल के देखूँगा

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जागती आँखों के ख़्वाबों को ग़ज़ल का नाम दे

रात भर की करवटों का ज़ाइक़ा मंज़ूम कर

मंज़ूम = versified

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ज़ख़्म की सूरत नज़र आते हैं चेहरों के नुक़ूश

हम ने आईनों को तहज़ीबों का मक़्तल कर दिया

तहज़ीबों = civilisations मक़्तल = a place of slaughter

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शाम ने जब पलकों पे आतिश-दान लिया

कुछ यादों ने चुटकी में लोबान लिया

आतिश-दान = fireplace

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इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले

राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले

तीरगी= darkness

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देवताओं और ख़ुदाओं की लगाई आग ने

देखते ही देखते बस्ती को जंगल कर दिया

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ग़ज़ल

सिर्फ़ सच और झूट की मीज़ान में रक्खे रहे

हम बहादुर थे मगर मैदान में रक्खे रहे

मीज़ान= balance

जुगनुओं ने फिर अँधेरों से लड़ाई जीत ली

चाँद सूरज घर के रौशन-दान में रक्खे रहे

धीरे धीरे सारी किरनें ख़ुद-कुशी करने लगीं

हम सहीफ़ा थे मगर जुज़्दान में रक्खे रहे

सहीफ़ा= a religious book जुज़्दान= cloth to wrap up book

बंद कमरे खोल कर सच्चाइयाँ रहने लगीं

ख़्वाब कच्ची धूप थे दालान में रक्खे रहे

दालान = verandah

सिर्फ़ इतना फ़ासला है ज़िंदगी से मौत का

शाख़ से तोड़े गए गुल-दान में रक्खे रहे

ज़िंदगी भर अपनी गूँगी धड़कनों के साथ साथ

हम भी घर के क़ीमती सामान में रक्खे रहे

  • राहत इंदौरी ( 1950-2020 )