सह अस्तित्व – नेहल

हजारों कन्सट्रकशन वर्क के रजकणसे
घूंटा हुआ हवा का दम छूटा और ली राहत की साँस
बेवजह इधर-उधर दौडते रहते पहियों के
धुंए से चोक हुए गले को पवनने किया साफ़
आह, आसमान आज लगे नहाया, साफ़, नीला
धूप चमक रही उजली
तृणांकुर अपना कोमल शीश उठाए देख रहे अजूबा
वातावरण में गूंजती पक्षियों की ऑर्केस्ट्रा पर
डोल रहे है पेड़
प्रकृति मना रही है उत्सव
अपने अस्तित्व का
कभी न रूकता कहीँ न रूकता मानव
शिख रहा है सह अस्तित्व

  • नेहल वैद्य