कुछ चुने हुए शेर : ​सलीम कौसर

बिछड़ती और मिलती साअतों के दरमियान इक पल
यही इक पल बचाने के लिए सब कुछ गँवाया है                       साअतों = times
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साँस लेने से भी भरता नहीं सीने का ख़ला
जाने क्या शय है जो बे-दख़्ल हुई है मुझ में                             बे-दख़्ल= outcast from right
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जल उठे हैं सर-ए-मिज़्गाँ तिरी ख़ुशबू के चराग़                         सर-ए-मिज़्गाँ = on eyelashes
अब के ख़्वाबों की अजब फ़स्ल हुई है मुझ में
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वो वक़्त भी गुज़रा है कि देखा नहीं तुम ने
सहराओं को दरिया की रवानी से निकलते                               रवानी = speed
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शायद कि ‘सलीम’ अम्न की सूरत नज़र आती
हम लोग अगर शोला-बयानी से निकलते                              शोला-बयानी= flame like narration
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कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है
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क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं
कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं
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मुझी में था वो सितारा-सिफ़त कि जिस के लिए                       सितारा-सिफ़त = quality of star
मैं थक गया हूँ ज़माने की ख़ाक उड़ाते हुए
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मेरी आँखों पे उस ने हाथ रखा
और इक ख़्वाब की महूरत की

– सलीम कौसर (Born 24th Octo. 1947)

source:rekhta.org