हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ – सूर्यभानु गुप्त

हैज़ा, टी. बी.,चेचक से मरती थी पहले दुनिया
मन्दिर, मसजिद, नेता, कुरसी हैं ये रोग अभी के

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इक मोम के चोले में धागे का सफ़र दुनिया,
अपने ही गले लग कर रोने की सज़ा पानी।

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हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ

हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ

मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी
मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ

रिश्ते गुज़र रहे हैं लिए दिन में बत्तियाँ
मैं बीसवीं सदी की अँधेरी सुरंग हूँ

निकला हूँ इक नदी-सा समन्दर को ढूँढ़ने
कुछ दूर कश्तियों के अभी संग-संग हूँ

माँझा कोई यक़ीन के क़ाबिल नहीं रहा
तनहाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ

ये किसका दस्तख़त है, बताए कोई मुझे
मैं अपना नाम लिख के अँगूठे-सा दंग हूँ

सूर्यभानु गुप्त ( Born 1940)
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