मेरा एकांत -सुरेश जोशी

मेरा एकांत
मैं देता हूं तुम्हें एकांत—
हंसी के जमघट के बीच एक अकेला अश्रु
शब्दों के शोर के बीच एक बिंदु भर मौन

यदि तुम्हें सहेजकर रखना है तो यह रहा मेरा एकांत—
विरह सम विशाल
अंधेरे सम नीरंध्र
तुम्हारी उपेक्षा जितना गहरा
जिसका साक्ष्य न सूर्य, न चंद्रमा
ऐसा केवल एकांतातीत एकांत

नहीं, क्रोधित मत होना
मेरी परछाईं ने भी उसका स्पर्श नहीं किया है
और न ही उसमें मिश्रित है मेरा शून्य
जितना मेरा वह एकांत उतना ही दो वृक्षों का
उतना ही समुद्र का
और ईश्वर का भी

यह एकांत—
नहीं है हमारे प्रणय की धन्य धरा
और विरहिणी विहार धरा

सिर्फ भरा हुआ एकांत
मैं देता हूं तुम्हें एकांत
सुरेश जोशी (Hindi Translation:सावजराज )

सुरेश जोशी (30 मई 1921 – 6 सितंबर 1986) गुजराती भाषा के प्रसिद्ध कवि, कथाकार, निबंधकार, आलोचक और अनुवादक हैं. उन्हें 1983 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, जिसे उन्होंने लेने से मना कर दिया था.
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सावजराज युवा कवि, लेखक, पत्रकार, अनुवादक और यायावर हैं. वह गुजराती में लिखना तर्क कर चुके हैं, और इन दिनों अपना रचनात्मक-कार्य हिंदी में कर रहे हैं, जिसे कहीं प्रकाशित करवाने की उन्हें कोई जल्दी नहीं है. उनके दिलचस्प परिचय और काम की एक झलक ‘सदानीरा’ के 19वें अंक में संभवतः दिखाई दे. उनसे sawajraj29292@gmail.com पर बात की जा सकती