कुमार पाशी – चुनिंदा अशआर

हवा के रंग में दुनिया पे आश्कार हुआ
मैं क़ैद-ए-जिस्म से निकला तो बे-कनार हुआ

आश्कार = clear, manifest, visible, व्यक्त, प्रकट, ज़ाहिर, स्पष्ट, साफ़
बे-कनार = boundless, without a shore, infinite

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पढ़ के हक़ाएक़ कहीं न अंधा हो जाऊँ
मुझ को अब हो सके तो कुछ अफ़्साने दो

हक़ाएक़ = facts, realities

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मैं तेरी सारी तमाज़त को जज़्ब कर लूँगा
तू आफ़्ताब कभी मेरे दिल में बुझने आ

तमाज़त = intense heat, जज़्ब = absorbed

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बैठ के तन्हाई में आप अपने से
कोई पुराना रिश्ता ढूँढ रहा हूँ

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जो कुछ नज़र पड़ा मिरा देखा हुआ लगा
ये जिस्म का लिबास भी पहना हुआ लगा

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शहर वाले सभी बे-चेहरा हुए हैं ‘पाशी’
हम ये किन लोगों को आईना दिखाने निकले

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आप अपने से बाहर आ कर भी सब देख लिया सब जान लिया
आलम है ये सारा भेद भरा पर्दे से परे पर्दा ही तो है

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कोई तो ढूँड के मुझ को कहीं से ले आए
कि ख़ुद को देखा नहीं है बहुत ज़मानों से

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भरी दो-पहरी साए बनाता रहता हूँ मैं लफ़्ज़ों से
तारीकी में बैठ के माह-ए-मुनव्वर लिखता रहता हूँ

तारीकी = darkness, obscure, माह-ए-मुनव्वर = bright moon
– कुमार पाशी (1935-1992)