ग़ज़ल – शहरयार

बताऊँ किस तरह अहबाब को आँखें जो ऐसी हैं
कि कल पलकों से टूटी नींद की किर्चें समेटी हैं

सफ़र मैंने समंदर का किया काग़ज़ की कश्ती में
तमाशाई निगाहें इसलिए बेज़ार इतनी हैं

ख़ुदा मेरे अता कर मुझको गोयाई कि कह पाऊँ
ज़मीं पर रात-दिन जो बातें होती मैंने देखी हैं

तू अपने फ़ैसले से वक़्त अब आगाह कर मुझको
घड़ी की सूइयाँ कब से इस इक नुक़्ते पे ठहरी हैं

जतन तेरा कि पहुँचाया है मुझको मौत के मुँह तक
मेरी आँखें कि इसको ज़ीस्त का ज़ीना समझती हैं
– शहरयार  (संपादक: कमलेश्वर)
The Urdu poet Kunwar Akhlaq Muhammad Khan “Shahryar” (1936–2012)

अहबाब = स्वजनों, अता = प्रदान, गोयाई = वाणी, ज़ीस्त = जीवन, ज़ीना = सीढ़ी

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