मख़मली ढलानों पर – दीप्ति नवल

मख़मली ढलानों पर

मख़मली ढलानो पर आख़िरी आवाज़ थम चुकी है चरवाहे की
दिन है कि दबे पांव गुज़र रहा है करीब से
सफेद चोटियों पे रंग बिखेर रही है शफक
नर्म हवाओं से गूंजती वादीमें
कहीं कच्चे रास्ते है, कहीं पानी की जैसे गलियां सी
और खेल रही है गलियों में
डूबते हुए सूरज की एक आखिरी किरण अभी तलक
यूं लगता है जैसे कांच पिघल कर बह रहा हो राहों में

गूंजने लगी हैं देखो, घंटियां कहीं मंदिर की
और सामने वाली चोटी से आ रही हैं सदाएं गिरजे से
दूर कहीं फिर मस्जिद में लरज़ती हुई उठी हैं अजां

कैसी वस्ल की शाम है यह, पहले तो कभी देखी नहीं
इसी शाम की मुन्तज़िर थी शायद
ठहर गयी हूं चलते-चलते
कुदरत और खुदा की अज़मत के आगे
दिल झुक गया है सजदे में
– दीप्ति नवल
(‘लम्हा लम्हा’ से)

शफक = सूर्य के निकलने और डूबने के समय क्षितिज पर दिखाई देनेवाली लाली
वस्ल= union मुन्तज़िर= waiting, expecting
अज़मत= grandeur, greatness सजदे = prayer

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