दिल के काबे में नमाज़ पढ़ – नीरज

दिल के काबे में नमाज़ पढ़

दिल के काबे में नमाज़ पढ़, यहां-वहां भरमाना छोड़।
सांस-सांस तेरी अज़ान है, सुबह शाम चिल्लाना छोड़।

उसका रुप न मस्जिद में है
उसकी ज्योति न मंदिर में
जिस मोती को ढूंढ़ रहा तू,
वो है दिल के समुन्दर में।

मन की माला फेर, हाथ की यह तस्वीह घुमाना छोड़।
दिल के काबे में नमाज़ पढ़, यहां-वहां भरमाना छोड़।

जो कुछ बोले हैं पैगम्बर,
वही कहा सब संतों ने,
लेकिन उसके मानी बदले
सारे भ्रष्ट महन्तों ने ।

पंडित-मुल्ला सब झूठे हैं, इनसे हाथ मिलाना छोड़।
दिल के काबे में नमाज़ पढ़, यहां-वहां भरमाना छोड़।

खुदा ख़लक से अलंग नहीं है,
इसमें ही वो समाया है,
जैसे तुझमें ही पोशिदा,
तेरा अपना साया है।

दुनिया से मत दूर भाग, बस खुद से दौड़ लगाना छोड़।
दिल के काबे में नमाज़ पढ़, यहां-वहां भरमाना छोड़।

पूजा पाठ, नमाज-जाप
सब छलना और दिखावा है
दिल है तेरा साफ तो
तेरा घर ही काशी काबा है।

मकड़जाल है ये सब के, इनका ताना-बाना छोड़।
दिल के काबे में नमाज़ पढ़, यहां-वहां भरमाना छोड़।

तू ही तो संसारी है रे
और तू ही संसार भी है,
कैदी तू ही जेल भी तू ही
तू ही पहरेदार भी है।

तीन गुनों वाली रस्सी में, अब तो गांठ लगाना छोड़।
दिल के काबे में नमाज़ पढ़, यहां-वहां भरमाना छोड़।

महाकवि डॉ गोपालदास नीरज ( born 4th jan 1925 )

[कारवां गुज़र गया से]

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