कबीर बानी-Poems of Kabir

मुरली बजत अखंड सदा से, तहाँ प्रेम झनकारा है।
प्रेम-हद तजी जब भाई, सत लोक की हद पुनि आई।
उठत सुगंध महा अधिकाई, जाको वार न पारा है।
कोटि भान राग को रूपा, बीन सत-धुन बजै अनूपा ।।

यह मुरली सदा से निरंतर बज रही है, और प्रेम इसकी ध्वनी है। जब मनुष्य प्रेम की सीमाओं से पार निकल जाता है तो सत्यलोक की सीमा आती है। वहाँ सुगंध का अपार विस्तार है। यह राग करोड़ों सूर्यो का रूप धारण कर रहा है। वीणा पर सत्य की अनुपम धुन बज रही है।

कबीर बानी
अली सरदार जाफ़री

The Flute of the infinite is played without ceasing, and its sound is love:
When love renounces all limits, it reaches truth.
How widely the fragrance spreads! It has no end, nothing stands in its way.
The form of this melody is bright like a million suns:
incomparably sounds the veena, the veena of the notes of truth.

by Rabindranath Tagore

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