मुसाफ़िर – बशीर बद्र

सदियों की गठरी सर पर ले जाती है
दुनिया बच्ची बन कर वापस आती है

मैं दुनिया की हद से बाहर रहता हूँ
घर मेरा छोटा है लेकिन जाती है

दुनिया भर के शहरों का कल्चर यक्साँ
आबादी, तनहाई बनती जाती है

मैं शीशे के घर में पत्थर की मछली
दरिया की खुश्बू, मुझमें क्यों आती है

पत्थर बदला, पानी बदला, बदला क्या
इन्साँ तो जज़्बाती था, जज़्बाती है

काग़ज़ की कश्ती, जुग्नू झिलमिल-झिलमिल
शोहरत क्या है, इक नदिया बरसाती है
बशीर बद्र ( मुसाफ़िर ) 1998

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2 thoughts

  1. मैं शीशे के घर में पत्थर की मछली
    दरिया की खुश्बू, मुझमें क्यों आती है

    Enjoying Janab Bashir Badr after a long long time !!

    Old memories have revived.

    Thank you.

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