ग़ज़ल – Ghazal – कैफ़ी आज़मी

ग़ज़ल

मैं ढूँढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता
नयी ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता

नयी ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाये
नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

वह तेग़ मिल गयी जिससे हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता

वह मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिनमें शोले तो शोले, धुँआ नहीं मिलता

जो इक खुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्या
मुझे ख़ुद अपने क़दम का निशाँ नहीं मिलता

खड़ा हूँ कबसे मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता

कैफ़ी आज़मी

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Ghazal

The world I seek I cannot find
A new earth, a new sky I cannot find.

A new earth, a new sky even if I found
No trace of a new man can I find.

I have found the dagger that was used to slay me
No one’s fingerprints on it can I find.

That is my village, those my village hearths
Let alone the embers, smoke I cannot find.

It is no great calamity if God cannot be found
A trace of my own footprints I cannot find.

For an eternity I have stood here among the crowd
Not a trace of your face can I find.

Translated by Pavan K Varma
[ From selected poems Kaifi Azmi ]

 

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