कुछ चुनिंदा अशआर- बशीर बद्र

हम भी दरया हैं हमें अपना हुनर  मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कही मील का पत्थर नहीं देखा

कही यूँ भी आ मिरी आँखमें कि मिरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

गर्म कपड़ों का सन्दूक़ मत खोलना, वर्ना यादों की काफूर जैसी महक
खून में आग बन कर उतर जायेगी, सुब्ह तक ये मकाँ ख़ाक हो जायेगा

ख़ुदा की इतनी बड़ी काइनात में मैंने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला

घड़ी दो घड़ी हम को पलकों पे रख
यहाँ अाते आते ज़माने लगे

ख़ुदा एेसे एहसास का नाम है
रहे सामने ओर दिखाई न दे

लेहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ

अपने आंगन की उदासी से ज़रा बात करो
नीम के सूखे हुए पेड़ को सन्दल कर दो

सन्नाटे की शाख़ों पर कुछ ज़ख़्मी परिन्दे हैं
ख़ामोशी बज़ाते खुद आवाज़ का सेहरा है

नाहा गया था मैं कल जुग्नुओं की बारिश में
वो मेरे कांधे पे सर रख के खूब रोई थी

चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से ज़मीं
ग़ज़ल के शेर कहाँ रोज़ रोज़ होते हैं

वक़्त के होंट हमें छू लेंगे
अनकहे बोल हैं गा लो हमको

–  बशीर बद्र

Dr. Bashir Badr

2 thoughts

  1. Waah , his style is unique , subtle but creates a long lasting impression on your mind! The more I read him , I want to read even more of his “Kalam” !

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  2. दो शेरा और :

    तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
    फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला।

    उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
    न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

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