सुकून

कल रात जब मैने
बिना नींद के पथराइ आँखोसे देखा ।

आधा अधूरासा चाँद खिला था
मैले धूंधले आसमाँ के माथे पर ।

पेड चुपचाप से खडे थे
एक पत्ता भी हिलाये बिना सुन रहे थे;
एक-दूजे की गोद मे लेटे मकानो की फुसफुसाहट!

एक हवाकी लहर जो गूजरा करती थी हमारे दरमियाँ

आज न जाने कहा खो गई ?!

-नेहल

3 thoughts

Comments are closed.