एक अलग अंदाज़….

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एक अर्से के बाद अपनी तन्हाई से रुबरु हो गये,
ना उसने कुछ पूछा ,  ना हम बयां  करने रुके !

ज़ींदगीकी की किताब आखरी पन्ने तक पलटते गये,
जो जिया हमने, वोह गहराइ में लब्ज़  कहां उतर पाये !

तेर्री परस्तीमें ही खूश होके जिते गये ,
तेरे मिलने के वादों पे एतबार कहां कर पाये !

_नेहल

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